Sunday, 18 December 2016

उन्कर बात  बेवहार  गजब 



उन्कर   बात  बेवहार  गजब,
जीये के सबो  अधार  गजब.

सब  के  जीना  दूभर   होगे,
सत्ता उन्कर सरकार  गजब.

मन मा कपट मुँह मा मिसरी,
बोली-बानी  मा  घार  गजब.

सब ले नजर बँचा  के  करथे,
उन्कर जम्मो  बइपार  गजब.

'बरस ' कहत हे सँभल के रहिबे,
कातिल  सरहद  के  पार  गजब.

-बलदाऊ राम साहू
मो 9407650458

थोरिक मुसकावन दे
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आँखी ले आँखी के बात होवन दे,
ऊपर ले चुप, अंतस गोठियावन दे।

अंतस के बात ह  अंतस तक पहुँचथे,
हिरदे ल  तैं  हिरदे ले  मिलावन  दे ।

सुवारथ के भाव ल दुरिहा राख तैं,
थोरिक हाँसन थोरिक मुसकावन दे ।

मया के कतको डोर उरझे हे जग म,
सुनता के जोर म येला फरियावन दे ।

मया जनम-जनम के नाता होथे ' 'बरस'
अंतस के राग- द्वेस ल टरियावन दे ।

मोदी के जबर कमाल हो गे रे 

ये  दे  मोदी  के  जबर  कमाल हो गे रे,
हमर देशे ह अब  मालामाल  हो  गे  रे.

राहुल हर रोवय अउ सोनिया हर रोवय,
दिग्विजय  के  मुँहू  हर  लाल  हो  गे  रे.

नीतिश अउर  लालू हर करम  ठठावय,
मुलायम  के अब  तो  हलाल  हो  गे  रे.

बहिन जी काहत  हे मोदी  बईमान  हे,
वोकरो   अब    हाल-बेहाल  हो  गे  रे.

कऊँवा कस कटरत अरविंद हर रहिस,
शरीफ़ के  कुकुर  कस  हाल  हो  गे  रे.

नेता अउ अफसर के थोथना हर टूट गे,
पईसा हर उन्कर बर अब काल हो गे रे.

पईसा ला ओढ़े  अऊर  पईसा  बिछावे.
उँकरो  घर पईसा के  अंकाल हो  गे  रे.

- बलदाऊ राम साहू
मो. 9407650458



या मोदी तेरा यह कैसा कमाल है 

या  मोदी तेरा  यह  कैसा  कमाल  है,
कल तक नवाब, वो आज फटेहाल है.

मुरझाये    मुलायम,   केजरी    गरमाये,
बहिन जी कहत हैं, यह सियासी चाल है.

राहुल जी दुखड़ा  अब  किसको सुनायें,
बाहर  मुस्काते   हैं,  भीतर   हलाल  हैं.

लालू औ' राबड़ी का खयाल जब पूछें,
कहते  हैं   हरदम  वे  मोदी  चांडाल  हैं

नेता   महाजन  जो  दौलत  दबाये  थे,
जीयेगे   कैसे  वो  और  ढाई  साल हैं

अफसर की बीबियाँ लगती चालाक थीं,
कल तक बेबाक थीं, वो आज बेहाल हैं.

सरहद पर जिनकी गिद्ध-सी निगाह थी,
कह रहें है   वे  भी  मोदी  नहीं  काल हैं

@बलदाऊ राम साहू
मो 9407650458



पाँच  बरस  बर  नेता बन  हरहा कस मेछरावत हे 


जेकर मुँह मा भाखा नइ हे किसिम-किसिम गोठियवत हे,
पाँच  बरस  बर   नेता   बन     हरहा  कस  मेछरावत  हे.

पद   ला   पा   के  अंते-तंते    रद्दा   मा   रेंगे   वो   मन
अपन  पूछी  ला   घेरी-बेरी   कुकुर   कस   सँहरावत हे.

बिद्वान  सही पूजत रहिथन   निचट  भकला हावन जी
सिधवा मनखे  ला वो मन  हा नाच   गजब  नचावत हे.

अगुआ  मन  के  तोनगी   घर  के  कुरसी  ला  पाये  हे
जम्मो   राजकोसी   धन   ला  धीरलगहा  पगुरावत   हे

सत्ता  के   मद   मा   जबर   बनगे   हे  अत्याचारी   रे,
लिखरी-लिखरी बात बर छाती ला गजब तनियावत हे.



जनता सबो बेहाल 

कोन पूछे काकर ले भैया
तिरपट नवा सवाल
जनता सबो बेहाल.

जम्मो डहर लूटपाट हे
मौज करें अपराधी
न्याय तराजू ऊँकरे हाथ मा
जिन्कर तन मा खादी
लोकतंत्र अब हमला लागथे
जीव के रे जंजाल.

चाल-चरित्तर मा कीरा परगे
फोकट गाल बजाये
साधु-संत के बाना धर के
पापी कस चाल चिन्हाये
हाँ मा हाँ मिलइया कतको
हावय इहाँ दलाल.

नवा-नवा इतिहास जम्मो झन
अपन-अपन लिखत हें
जेकर छप्पन के छाती हे
करनी मा दिखत हे
नाक बचा लेवव नकटा मन
पूछे प्रश्न बेताल.

कोख उझर कतको इहाँ
कब तक धीरज धरबो
मुढ़ ले पानी उप्पर होगे
सबर कब तक करबो
गुस्सा आँखी मा तउरत हे
छाती मा बरे  मशाल.

@बलदाऊ राम साहू
सहायक संचालक
आदिम जाति अनुसूचित जाति विकास
इंद्रावती भवन, नया रायपुर



साँपों को दूध पिलाया नहीं करते 



साँपों को दूध पिलाया नहीं करते ,
आस्तीन में उन्हें पाला नहीं करते ।

समय तेज उड़ रहा है पंख लगाकर
बीती बातों को विचारा नहीं  करते ।

बाधाएँ  आती  हैं,  राही  के  आगे,
पर हौसला यूँ ही हारा नहीं करते ।

मतलबी हैं सब कोई यहाँ पर मगर,
हर वक्त अपनों को पराया नहीं करते ।

छिपकर बैठे हों बहेलिए जब  आड़ में,
पंख  आसमाँ  में  पसारा  नहीं  करते ।


बलदाऊ राम साहू
9407650458

Friday, 14 October 2016

नवगीत

जिसे देखिए वही राह में
काँटे बोते हैं

भाई का भाई से अनबन
भौजाई तो हुई पराई
और पड़ोसी सब लगते हैं
पूरे  निर्दयी कसाई
दुनिया की ये रीत देखकर
हम तो रोते हैं

पैसों से ही तौले जाते हैं
रिश्तों की गहराई
मान, प्रतिष्ठा और पद की
होती है खूब बड़ाई
कुंठाओं की विष-बेलें
खुद ही बोते हैं.

संबंधों के बीचोंबीच अब
स्वार्थ पनपते हैं
अपने ही  सब सगे-संबंधी
बैरी लगते हैं
अनचाहे संबंधों का ही
बोझ सदा  ढोते हैं

-बलदाऊ राम साहू
 मो 9407650458

Thursday, 13 October 2016

ग़ज़ल

               भाव नया जगाना है

धीरे-धीरे  भीग  रहा  है  माँ   का  आँचल  आँसू  से,
पर बेटे  को  याद  कहाँ  है मन  उनका  बहलाना  है.

जंगल,  धरती,  झाड़-झरुखे  झुलस  रहे  अंगारों  से,
फिर भी दुश्मन सूरज कहता, इनको अब बतलाना है.

ओठ  चबाते  चट्टानों पर बैठा कोई   दुखिया  लगता,
उसके  भीतर  जज्बातों  का  भाव  नया  जगाना   है.

शोषण औ' संघर्षो की गाथाओं  से इतिहास  भरा है,
अब  अपने हक का  उसमें  अध्याय नया  लगाना  है.

भीतर में जो आग दबी थी धुआँ धुआँ-सा लगता  था,
उसको देकर हवा जरा- सी फिर से अब  भड़काना  है.

एक कबूतर  चिट्ठी  लेकर  सरहद  के  उस  पार  गया,
सरहद पार बैठे  हैं  कातिल  यह  उसको  समझाना  है.

@बलदाऊ राम साहू
  मो 9407650458

Monday, 3 October 2016

ग़ज़ल
आदमी को असहाय बनाती है गरीबी

आदमी को  असहाय  बनाती  है  गरीबी,
मौत का अहसास भी  कराती  है  गरीबी.

सो  रहा  है  चूल्हा  भी  हाँडी  उपास  है
राह  ये  पतन   की   दिखाती  है  गरीबी.

दिन भर संघर्ष की जो गाथा बहुत लिखी
रात   में   दर्द   को   दुहराती   है   गरीबी.

मान और अपमान में अब फर्क कहाँ रहा,
खून  का   घूँट  हमें   पिलाती   है   गरीबी.

जीतने का जज़्बा हममें  बहुत है  लेकिन,
जीत  में भी  हार  को  दिखाती  है गरीबी.

पाप  और  पुण्य  की  उलझनें  हैं  बहुत,
इंसाँ  को  शर्मसार  कर  जाती है  गरीबी

डूबने  के डर  से क्यूँ  बैठा  है  तू  ’बरस’
आदमी  को   इंसान   बनाती  है  गरीबी.

@बलदाऊ राम साहू
 मो 9407650458

Monday, 26 September 2016

विज्ञान लेखन की समस्याएँ और संभावनाएँ
बलदाऊ राम साहू
हिन्दी भारत की राजभाषा है, किंतु यह हमारा दुर्भाग्य है कि आज अधिकतर लेखक अपनी बात हिन्दी भाषा में लिखने में संकोच करते हैं और अंग्रेजी में लिखकर अपने आपको गौरवान्वित महसूस करते हैं। विज्ञान लेखन के क्षेत्र में तो यह प्रवृतियाँ और अधिक देखी जाती है। अधिकतर वैज्ञानिक अपना काम अंग्रेजी में संपादित करते हैं, शोध आलेख अंग्रेजी में लिखते हैं और पढ़ते हैं। शायद उन्हें हिन्दी में सोचने का समय ही ना मिलता होगा! अंग्रेजी उनके दिलोदिमाग में घर कर गया है। वे अंग्रेजी के मोहजाल से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं।  यही कारण है कि हिन्दी में लेखन की संभावनाएँ समाप्त होती जा रही हैं, जो कि हर भारतीय के लिए चिंता का विषय है।
अधिकतर पढ़े लिखे लोग अंग्रेजी में पढ़ने, लिखने व कार्य करने में गर्व महसूस करते हैं और अपने को सम्मानित भी। किंतु यह समझना होगा कि इस हम तरह कहीं हिन्दी भाषा की उपेक्षा तो नहीं कर रहे हैं ? यदि यही चलता रहा तो हिन्दी लेखन की संभावनाएँ समाप्त हो जाएगी और हम हाथ मलते रह जाएँंगे। विज्ञान लेखन तो दूर हम हिन्दी में इतिहास और भूगोल भी नहीं लिख पाएँगे और आने वाले पीढ़ी भाषायी विकलांगता महसूस करेगी।
प्रायः देखा जा रहा है कि आने वाले पीढ़ियों में हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं में विज्ञान पढ़ने वालों की संख्या कम होती जा रही है। इसे हम बदलते वक्त का तकाजा कहें या पश्चिम का अंधानुकरण। दरअसल वह समय आ गया है जब आने वाली पीढ़ी को अपनी मातृभाषा में काम करने की शुरूआत करनी होगी। इससे न केवल भाषा समृद्ध होगी, बल्कि हममें आत्मगौरव का विकास भी होगा।
अक्सर सवाल उठाया जाता है कि यदि हम विज्ञान को अंग्रेजी के अतिरिक्त हिन्दी व अन्य क्षेत्रीय भाषा में पढ़ें व लिखें तो उसकी वैज्ञानिक शब्दावलियाँ नहीं मिल पाती। यह शायद हमारे मन का भ्रम है। जब लेखन ही नहीं होगा तो शब्द आएँगे कहाँ से? शब्दों का आविष्कार आवश्यकता पर निर्भर होता है। जब आवश्यकता महसूस होगी, तब उन तकनीकी शब्दों के लिए नवीन शब्द भी गढ़े जाएँगे। वे शब्द प्रचलन में आएँगे और भाषा को समृद्ध करेंगे। सतत् लेखन से ही भाषा समृद्ध होगी और लेखन की संभावनाएँ विकसित होंगी। कुछ लेखकों का यह भी मानना है कि हिन्दी में तकनीकी शब्दावलियाँ क्लिष्ट होती हैं, यह भी विचारणीय प्रश्न हो सकता है।
हिन्दी में विज्ञान लेखन हेतु वर्तमान में हिन्दी भाषी विज्ञान लेखकों को वैज्ञानिक शब्दावली विकसित करने तथा हिन्दी भाषा के क्लिष्ट वैज्ञानिक शव्दावलियों को रूपांतरित कर सहज बनना होगा। उदाहरण के लिए भौतिकी में अंग्रेजी शब्द तमसनबजंदबम का हिन्दी पर्याय प्रतिष्टम्भ होता है, जो दुरूह कहा जा सकता है। यदि यह सही में दुरूह है, तो इसे सहज करने के लिए विकल्प भी तलाशना होगा और हिन्ही भाषा के वैज्ञानिक शब्दावली से प्रतिस्थापित करना होगा। इस विषय पर यह  भी समझने की आवश्यकता है कि जब तक शब्द प्रचलन में नहीं होगें, तो क्लिष्टता का भान होगा ही, शब्द महज ध्वनियाँ नहीं होती शब्द संस्कृति का हिस्सा होता है। वह मानय पटल पर रचा-बसा होता है। शब्द प्रयोग में आते हैं तबे उनका नवीन संसार बनता है। शब्दों का एक बड़ा संसार होता है। विज्ञान लेखन के संदर्भ में हमें उसकी उत्पत्ति और प्रभुत्व को समझना होगा। हिन्दी भाषा में विज्ञान लेखन की संभावना को तलाशने के लिए भाषायी गौरव को जगाने की भी आवश्यकता है। तभी आगे चलकर हिन्दी भाषा में विज्ञान विषय पर लेखन किया जा सकेगा।
सहायक संचालक
आदिम जाति अनुसूचित जाति विकास विभाग, इंद्रावती भवन, नया रायपुर, छत्तीसगढ़ 

Friday, 23 September 2016

नवगीत

जनता सबो बेहाल

कोन पूछे काकर ले भैया
तिरपट नवा सवाल
जनता सबो बेहाल.

जम्मो डहर लूटपाट हे
मौज करें अपराधी
न्याय तराजू ऊँकरे हाथ मा
जिन्कर तन मा खादी
लोकतंत्र अब हमला लागथे
जीव के रे जंजाल.

चाल-चरित्तर मा कीरा परगे
फोकट गाल बजाये
साधु-संत के बाना धर के
पापी कस चाल चिन्हाये
हाँ मा हाँ मिलइया कतको
हावय इहाँ दलाल.

नवा-नवा इतिहास जम्मो झन
अपन-अपन लिखत हें
जेकर छप्पन के छाती हे
करनी मा दिखत हे
नाक बचा लेवव नकटा मन
पूछे प्रश्न बेताल.

कोख उझर कतको इहाँ
कब तक धीरज धरबो
मुढ़ ले पानी उप्पर होगे
सबर कब तक करबो
गुस्सा आँखी मा तउरत हे
छाती मा बरे  मशाल.

@बलदाऊ राम साहू 

Sunday, 18 September 2016

नवगीत

अगर कोसना है तो कोसो

गाली क्यों देते हो भाई
सत्ता के दलालों को.

किसकी नीयत कैसी है
यह समझ न आए
बैठ मंच पर यहाँ सभी
हरिश्चंद्र बन जाएँ
अगर कोसना है तो कोसो
खुद के ही सवालों को.

भ्रष्ट आचरण करना तो
है इनकी मजबूरी
छल, प्रपंच और धोखा देना
लगता बहुत जरूरी.
थप्पड़ क्यों मारे हम भाई
इनके चिकने गालों को.

दरबारों में बने रहना
होती  टेढ़ी खीर
सभी चाहते सत्ता सुख
पंडित हो या फकीर
झुककर करें सलाम सभी
इन ताकतवर चांडालों को

 - बलदाऊ राम साहू
   मो 9407650458
हिंदी ग़ज़ल



हम जनता हैं, रंगदारों से क्या लेना,
सत्ता के हिस्सेदारों   से  क्या  लेना.

जिनको सागर पार उतरना आता है,
 मल्लाहों को पतवारों से क्या  लेना.

हम तो आते-जाते  हैं, हम  राही हैं,
दुनिया को हम बंजारों से क्या लेना.

पेड़ घना है उस पर नन्हा-सा घर है,
बस दो दाने, बाजारों  से क्या  लेना.

नहीं  खेलना  आता  है  अंगारों  से,
हमें तोप औ’ तलवारों से क्या लेना.

सरकारी है कोष लूट लो जितना चाहो,
तुमको इन मिहनतदारों  से  क्या  लेना.



बलदाऊ राम साहू 
नवगीत

शीला की जवानी

हम सब को बूढ़ी लगती है
घर की राधा रानी
हरदम याद सताती है
शीला की जवानी.

कथा-पुराण सब व्यर्थ हुए
शास्त्र हुए निरर्थक
टी वी के सिरियल लगते
इस भुवन में सार्थक
हमको तो भाती नहीं है
दादी की कहानी.

ग्वाल-बाल  सब सखा रह गए
गोकुल वृंदावन में
रास नहीं होता है अब तो
गोपी संग मधुवन में
राधा के निच्छल प्रेम की
कथा हुई पुरानी.

धर्म, कर्म और नैतिकता
संबंध सभी नि:सार
भोग-बिलास में डूबा हुआ है
पूरा यह संसार
कुरुक्षेत्र में कौन सुनेगा
अब गीता की वाणी.

राग-द्वेष और छल-प्रपंच  से
सब का नाता है
पर निंदा, पर दोष गिनाना
सब को भाता है.
संबंधों की परिभाषा गढ़ना
लगती है बेईमानी.

-बलदाऊ राम साहू
   मो 9407650458

Friday, 16 September 2016

ग़ज़ल
तेरा ही अहसास राम जी

तेरा जब अहसास राम जी
तब कैसा सन्यास राम जी

जागे दया भाव जब मन में
शायद यही सुवास राम जी

राह बने और मंज़िल  पाएँ
वहीं  तुम्हारा  वास राम जी

तेरा हाथ औ’ सर  हो मेरा
मन क्यों रहे उदास राम जी

जब तक तेरी  कृपा  न होए
तब तक मन में प्यास राम जी

'बरस'  कहे व्यर्थ  है  दुनिया
अंतस का  विश्वास  राम  जी.

@बलदाऊ राम साहू
 मो 9407650458
ग़ज़ल

    अपने ही हाथों निखार किस्मत

गजब सयानी है यार किस्मत,
क्यूँ ठगती  हर  बार  किस्मत.

सभी  तरफ  भूख  औ'  बेकारी,
मिले सब को भात-दार किस्मत.

सभी को रोटी-दाल नसीब हो,
चूल्हा उपास धिक्कार किस्मत,

किसी पर बरकत यूँ ही लुटाये,
हमें कर देती  लाचार  किस्मत.

मुबारक  होली- दिवाली  उन्हें
हमें रुलाती सौ - बार किस्मत.

'बरस'अब निराश क्यों हो रहा है,
अपने ही हाथों  निखार  किस्मत.

@बलदाऊ राम साहू 

Friday, 9 September 2016

                          दिया तरी अँधियारी हे


काम    कहो,  सरकारी  हे जी,
संग    अपन    गद्दारी   हे जी.

लुटत  हवय  लुटईया  मन  हर
कहत   हवय   बइपारी   हे जी.

जउन मन ह खँचका ला खानिस,
ऊँकर  ले   अब   यारी   हे  जी.

जेकर  जस  मनखे   मन   गाथे,
वोकर      भारी  छाती   हे   जी,

जउन  ह  सिधवा  मनखे  हावय
उन्कर   खातिर    चारी   हे  जी.

देस  ल फोकला जउन करत हें,
उन्कर    घर    देवारी    हे  जी.

परगट    मरजाद   बेंचावत  हे,
काल  अपन  के   बारी   हे जी
 
'बरस' कहत  हे  जबर  इहाँ  रे,
दिया  तरी   अँधियारी   हे  जी,

-बलदाऊ राम साहू
 मो 9407650458

Monday, 5 September 2016

सामाजिक विसंगतियों पर कविता

हम सब को बूढ़ी लगती है
घर की राधा रानी
हरदम याद सताती है
शीला की जवानी.

कथा-पुराण सब व्यर्थ हुए
शास्त्र हुए निरर्थक
टी वी के सिरियल लगते
इस भुवन में सार्थक
हमको तो भाती नहीं है
दादी की कहानी.

ग्वाल-बाल  सब सखा रह गए
गोकुल वृंदावन में
रास नहीं होता है अब तो
गोपी संग मधुवन में
राधा के निच्छल प्रेम की
कथा हुई पुरानी.

धर्म, कर्म और नैतिकता
संबंध सभी नि:सार
भोग-बिलास में डूबा हुआ है
पूरा यह संसार
कुरुक्षेत्र में कौन सुनेगा
अब गीता की वाणी.

राग-द्वेष और छल-प्रपंच  से
सब का नाता है
पर निंदा, पर दोष गिनाना
सब को भाता है.
संबंधों की परिभाषा गढ़ना
लगती है बेईमानी.

-बलदाऊ राम साहू
   मो 9407650458
छत्तीसगढ़ के पर्व 'तीजा परब'  की शुभकामनाएँ

दू दिन पहिली तीजा गे हे,
नोनी के महतारी ह,
हमला गजब बिजरावत हावय,
सबले छोटे सारी ह.

मन ह तन ह सुन्ना लागथे,
जिनगी सुन्ना भइगे.
चाबे ला दऊड़त हावय,
अपने घर के दुवारी ह.

दार-भात चिबराहा हो गे,
नूनछुर हो गे साग,
बिल्कुल नइ सुहावय संगी
संझा  के बियारी  ह.

संग राहय तब चिकचिक लागे,
वोकर गोठ-बात
अाज गजब गुदगुदावत हावय,
वोकर  देय  गारी.

बचपन मा जेकर संग खेलेन
उही टूरी मन आये हे
जहर बरोबर लागथे संगी,
उन्कर खीर-सोंहारी ह.

कतको कहि ले समरथ हन
मन के ये भरम ये,
चारे दिन मा पता चलगे
मनखे के हुसियारी ह.

@बलदाऊ राम साहू
शिक्षक दिवस के अवसर पर सभी शिक्षक भाई-बहनों को हार्दिक शुभकामनाएं.

शिक्षक कहने से मन में एक अलग सी छवि उभर कर आती है.  वह है एक आदर्श मानव की. जो उच्च चारित्रिक मूल्य धारण करता हो, मेहनती, ईमानदार और बच्चों के लिए समर्पित हों, उनमें सांस्कृतिक चेतना का विकास करें,  ऐसे शिक्षक होते थे,  किंतु आज शायद  नहीं.
    सामाजिक परिवर्तन के साथ-साथ शिक्षकों के दृष्टिकोण में बड़ा परिवर्तन आया है. परिणाम स्वरूप शिक्षा में गिरावट आई है. समाज और बच्चों के मन में भी शिक्षकों के प्रति सम्मान के वे भाव नहीं दिखते,  जिनकी अपेक्षा की जाती रही है. शिक्षकों के मन में आई उदासीनता के प्रति सरकारी नीतियाँ काफी भी हद तक जिम्मेदार है. सरकार में बैठे लोग ढोल पिटते हैं कोई कारगर उपाय नहीं करते.  इन सब का खामियाजा बच्चे भुगत रहे हैं. आगे सब को सोचना होगा. क्या करें कि एक सभ्य, शालीन कर्तव्यनिष्ठ और उदार समाज का निर्माण हो सके.

जीवन की इस कठिन राह में
चलना हमें सिखाया.
नन्हे बीज सरीखे थे हम
वट-सा वृक्ष बनाया।

धोती - कुरता, और हाथ में
छाता लेकर चलते थे
बरसा जाड़ा या हो गरमी
देर कभी न करते थे
सूरज ने भी शायद उनसे
ग्यान यही पाया होगा
सारा काम समय पर करना
अपनों को समझाया होगा.
हम तो माटी के लौंदे थे
उसने कुंभ बनाया.

सत्यनिष्ठा, सहानुभूति की
मूर्ति वे लगते थे
काम निरंतर करते थे पर
कभी नहीं थकते थे.
परोपकार भाईचारे का
पाठ हमें पढ़ाया
हम सब के भीतर से उसने
अंधकार को दूर भगाया.
ग्यान जोत जलाकर हमको
मंज़िल तक पहुँचाया.

अपने  आदर्शों के चलते
लोक में पूजे जाते थे
कथा-पुराण और वेदों का
सार हमें समझाते थे
उनके भीतर माँ की ममता
पिता-सा था प्यार
सूरज, चाँद, समुंदर जैसा
था पूरा संसार ।
अभावों में रहकर उसने
गुरु का धर्म निभाया

-बलदाऊ राम साहू
आलेप्रे


आदिवासी संस्कृति में निहित टोटमवाद और पर्यावरण संरक्षण

 भारतीय संस्कृति में वृक्षों की बड़ी महत्ता है। वृक्षों को‘देव’माना गया है। हमारी संस्कृति में पीपल, नीम, आम इत्यादि वृक्ष पूजनीय है। इसी कारण वृक्षों को न ही काटने की परंपरा है न ही  जलाने की। आज भी गाँव में इन वृक्षों के लकड़ी को जलाऊ के रूप में उपयोग नहीं किया जाता। यह आदिवासी संस्कृति की देन है। स्नानादि करने के बाद वृक्षों को जल देने की परंपरा में वृक्षों के संरक्षण का ही भाव छिपा हुआ है । इन वृक्षों को‘देव’रूप में मानने का वैज्ञानिक आधार भी है। यदि हम अपनी परंपराओं का विश्लेषण करें, तो यह स्पष्ट होता है कि परंपरा का उद्भव मानव जीवन के विकास के लिए हुआ है। यदि हम तुलसी के पौधे पर ही बातें करें तो स्पष्ट है, तुलसी चौबीसों घंटे आॅक्सीजन प्रदान करती है, पर्यावरण को शुद्ध रखती है, यही नहीं तुलसी के पौधे कितने ही सारे औषधि गुणों से युक्त हैं। यदि इन परंपराओं का सम्यक उद्भव नहीं हुआ होता, तो पर्यावरण आज से कई सौ साल पहले नष्ट हो गया होता और मानव जाति खतरे में होता।
         आदिवासी संस्कृति की अपनी एक विशेषता है। बारीकी से हम आदिवासी संस्कृति, परंपरा, लोक जीवन और पर्वों का अध्ययन करें, तो अनके विकासात्मक तत्व दृष्टिगोचर होते हैं । हम सदियों से आदिवासियों को पिछड़ा मानते रहे हैं, उन्हें गँवार की संज्ञा देते रहे हैं, पर वास्तव में ऐसा नहीं है. आदिवासी संस्कृति में जो परंपराएँ हैं, उन सबका वैज्ञानिक दृष्टिकोण और संवेदना से युक्त मानवीय आधार है। हाँ, हम यह कह सकते हैं कि आदिवासी समाज तक शिक्षा का प्रकाश बहुत विलंब से पहुंचा है। वे औपचारिक शिक्षा इसलिए ग्रहण नहीं कर पाये, क्योंकि वे बीहड़ जंगलों में निवास करते थे। उनके पास आवागमन के पर्याप्त साधन नहीं थे। तथाकथित विकसित समाज ने अपनी साम्राज्यवादी/सामंतवादी सोच के कारण इन्हें शिक्षा से दूर रखा, किन्तु वे अपने अनौपचारिक स्रोतों से भलीभांति शिक्षित होते रहे हैं। सामाजिकता में शाँति, समरसता, भाईचारे का भाव उनके अंदर सदैव से रहा है । वे अपनी न्यून आवश्यकता के कारण सदैव संतुष्ट रहे और अपने बुजुर्गों से प्राप्त परंपरागत शिक्षा का उपयोग जीवन को सार्थक बनाने के लिए करते रहे।
          आदिवासियों की अपनी भाषा, संस्कृति एवं परंपराएँ हैं। इन परंपराओं में सामूहिक जीवन, सामूहिक उत्तरदायित्व और भावनात्मक संबंध कूट-कूटकर भरे हुए हैं। यही कारण है कि इनमें परस्पर विश्वास एवं स्वाभाविक संबंध कायम रहता है। ये केवल सहज, सरल, प्राकृतिक जीवन जीते हैं और यही प्राकृतिक जीवन पर्यावरण संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण कारक है।
   छत्तीसगढ़ के आदिम समाज में मानव समुदाय के बीच संबंध के अनेक रूप मिलते हैं जिसमें एक टोटम है। यह ऐसा ही संबंध है जैसे एक माँ से जन्मे भाई-बहन के बीच का होता है। यह संबंध प्राणी जगत के साथ अनेक रूपों में दिखाई पड़ता है। इन संबंधों को टोटमवाद कहा जाता है। आदिवासी अपने को किसी प्रकार के टोटम से संबद्ध मानता है, उनसे अपना अनुवांशिक रिश्ता जोड़ता है। यह टोटम किसी पशु, पक्षी या वृक्ष से होता है। इन्हीं संबंधों के आधार पर वे इनके प्रति विश्वास, श्रद्धा, भक्ति और आदरभाव रखते हैं और उनकी आराधना करते हैं। टोटम पर यदि कोई विपत्ति आती है, तो संबंधित जनजाति पर यह विपत्ति संभावित मानी जाती है। वे टोटम से संबंधित जीव को छूना, मारना, मारकर खाना पसंद नहीं करते। टोटम एक तरह से गणचिह्न हैं , जो किसी समाज के उस विश्वास को प्रकट करते हैं जिसका उनके जीवन से व्यापक सरोकार है। यदि हम टोटम का विश्लेषण करें, तो यह विशुद्ध रूप से मानववाद और प्रकृतिवाद का अतुलनीय उदाहरण है । एक-दूसरे से अन्योयाश्रित संबंध। टोटम का संबंध शायद जीव-जगत से लगाव व प्रकृति से प्रेम हो सकता है, जो कि प्रकृति संरक्षण का आदिम नियम है । यह स्वाभाविक है कि हम जिस पशु को पालते हैं उससे हमारा लगाव हो जाता है, ठीक उसी प्रकार हम अपने द्वारा रोपे गए पौधों को नहीं काटते। इसी भाव ने धीरे-धीरे परंपरा का रूप ले लिया। जो आज जैविक संतुलन व पर्यावरण को संरक्षित करने में अपनी अहम भूमिका रखता है। टोटम में निर्धारित जीव व वृक्ष का किसी न किसी तरह मानव जीवन से निकटम संबंध रहा है। यह पर्यावरण को सुरक्षित रखने में सहायक है। हम यह भी कह सकते हैं कि इस परंपरा के माध्यम से प्रत्येक व्यक्ति द्वारा किसी न किसी जीव को बचाने के लिए संकल्प लिया जाता है। इस तरह के संकल्प से न केवल जीव जगत और जंगल का संरक्षण होता है, बल्कि मानव जीवन के विकासात्मक दृष्टिकोण का प्रतिपादन भी होता है।
       टोटम पर चर्चा करते हुए गोंड आदिवासी समाज के प्रमुख श्री भरतलाल कोर्राम ने बताया कि आदिवासी गोंड समाज में 750 गोत्र हैं, जो कि 100-100 के समूह में 07 उपभागों में विभाजित हैं। 50 गोत्र गुरु गोत्र हैं । प्रत्येक गोत्र के तीन-तीन टोटम है। एक पशु, एक पक्षी और वृक्ष। इस टोटम परंपरा के माध्यम से हम आदिवासी 2250 जीवों का संरक्षण करते हैं।   यह परम्परा मूलतः पारिस्थितिक तंत्र पर आधारित है । यह रक्षण और भक्षण के सिद्धांत पर आधारित है। टोटम एक तरह से रक्ष् संस्कृति है। ‘रक्ष्’ अर्थात् रक्षा करना। इस तरह पर्यावरण का संरक्षण हमारी परंपरा का हिस्सा है।
     हम यह कह सकते हैं कि आदिवासी मन और आत्मा से पर्यावरण से जुड़ा हुआ है। यही जुड़ाव उनकी सामाजिक परंपराओं को परिलक्षित होता है। पर्यावरण से संबंधित आदिवासी समाज का ज्ञान, समझ और अनुभव व्यापक है। यही समझ उसकी सांस्कृतिक धरोहर का आधार है, किन्तु यह भी चिंता का विषय है कि तथाकथित शिक्षित आदिवासी समाज व युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति व धरोहरों से दूर होती जा रही है। इस पर केवल आदिवासी समाज को ही नहीं  बल्कि पूरे मानव समाज को विचार करना होगा और इन आदिम परंपराओं को अपने जीवन के साथ जोड़कर पर्यावरण संतुलन को बनाएँ रखने में अपना योगदान देना होगा ।

मौलिक एवं अप्रकाशित   बलदाऊ राम साहू
                                    सहायक संचालक
                         आदिमजाति विकास विभाग इंद्रावती भवन, डी. ब्लाक, नया रायपुर



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Tuesday, 23 August 2016



भारत के वीर शहीदों को नमन


मस्जिद, गिरजा, शिवाले आओ,
ध्वज   लहराने    वाले    आओ,

आजादी    का    जश्न    मनाने,
देश      के    रखवाले    आओ.

झगड़े    पाले   क्यों   रखते  हो,
प्यार    लुटाने     वाले     आओ.

प्यार ,  प्यार  से  ही   बढ़ता  है,
बच्चे    सभी    निराले    आओ.

जात-पात   सब   मिट  जाएँगे ,
दूरी     मिटाने    वाले     आओ.

अपने  कुछ  राह  भटक  गए  हैं,
राह     दिखाने     वाले    आओ.

कोई    कहता   बिगड़   गया  है,
उन्हें     बनाने      वाले    आओ.

'बरस'  समझे   या   ना    समझे,
जाने     स़भी   अनजाने   आओ.

@बलदाऊ राम साहू
मो 9407650458


मुफत मा तैं खा ले बाबू

मुफत  मा तैं  खा ले बाबू,
हाथ मल पछता  ले  बाबू.

ऊपर-ऊपर गुरुतुर हावय,
अंतस ला  करुवा ले  बाबू.

कागद ल तैं नाव  बना  ले,
चुरुवा  मा  तँउरा  ले  बाबू.

अंतस म तोर कपट भरे  हे,
मीठ-मीठ गोठिया ले  बाबू.

नइ फरय हे पेड़ मा पइसा,
धर  ले अउ  हला ले  बाबू.

बन जा  नेता, कर  करतूत,
मान गजब तैं  पा  ले  बाबू.

जग म कतको हाँसत हावय,
उन  सब  ला  रोवा  ले बाबू.

बइरी बन  जा  अपनेच्च  बर,
अफसर   तैं   कहा  ले  बाबू.

बेंच  डार  ईमान-धरम  ला,
धरमातमा   कहा   ले  बाबू.

@बलदाऊ राम साहू
 मो 9407650458
गुरुतुर = मीठापन, चुरुवा = चुल्लू


छत्तीसगढ़ी लोक गीत ददरिया

छत्तीसगढ़ी लोक साहित्य में ददरिया का महत्वपूर्ण स्थान है. यह लोक काव्य के रूप में कंठ-कंठ मैं बसता है. किसी समय में यह श्रम परिहार का माध्यम हुआ करता था, तो कभी प्रणय निवेदन का सशक्त सशक्त साधन.  प्रेमी युगल इस लोक गीत के माध्यम से सहज रूप में अपने भावों को अभिव्यक्त करते थे. यदि साहित्यिक दृष्टिकोण से विश्लेषण करें तो ददरिया का बिंब विधान अनूठा जान पड़ता है. इसका छंद भी अनोखा है. इसका प्रत्येक पद दोहे की भाँति अपने आप में पूर्ण होता है. इसका पहला और दूसरा चरण केवल तुक मिलाने के लिए कहा जाता है, जबकि तीसरे और चौथे चरण में पूरी बात कही जाती है.
     ददरिया को हम वर्णिक छंद कह सकते हैं. किन्तु  इसमें पर्याप्त भेद हैं. लोक गायकों के द्वारा गाये गये ददरिया स्वरागम पर आधारित दिखाई देता है. ददरिया के मूल पद को गाने के पहले घोर(मुखड़ा) होता है. घोर के आधार पर ही पदों की स्वर रचना की जाती है.
उदाहरण के लिए एक स्वरचित ददरिया प्रस्तुत है. यह मात्र एक उदाहरण है -

लड़का - हमर गाँव तीर वो,
            अमुआ बगीचा हमर गाँव तीर.

लड़की - हमर गाँव तीर गा,
            नदिया कछार हमर गाँव तीर.

लड़का-पीपर रूख मा बइठे हे पंछी,
           तैं राधा बन जा गोई, बजाहूँ बंसी.

लड़की-धाने ला बोये हरियच्च-हरिया,
           का कहत हावस बाबू बनेच्च फरिहा.

लड़का- तेल-तेलाई तैं बनेच्च करले
            तोर अँछरा मा गोई मया ला धरले.          
लड़की-गये ल जंगल  टोरे ला तेंदू-चार
         मिलजुल के हम करबोन, मया के बइपार.

लड़का - माटी मताये पैरोसी धरले
             मोर बाते के गोई भरोसी करले.

लड़की- बँबूरी के रूख मा काँटच्च-काँटा
            मोर मया के तैं संगी झन करबे बाँटा.

   बलदाऊ राम साहू
  मो 9407650458

 

 यह कैसी सरकार रे भाई



यह  कैसी  सरकार रे भाई,
लूलों को  पतवार  रे  भाई.

जिन हाथों  में सत्ता दे  दी,
लुच्चा वही  लबार  रे  भाई.

माझी  ने  पतवार छोड़ दी,
डूबी नाव  मझधार  रे भाई.

जिन कंधों पर हल था कल तक,
उन  हाथों   तलवार   रे  भाई.

खुद की बंदूक सीना खुद का,
कैसी करूण  पुकार  रे  भाई.

अब तक मन में आस बंधी थी,
जीत  कहाँ  सब  हार  रे  भाई.

टूट  गए  हैं   सब  नाते-रिश्ते,
हर   आँगन    दीवार  रे  भाई.

@बलदाऊ राम साहू

Friday, 8 July 2016

तोर आँखी  ले   काजर चोरा  लेतेंव,
तोला कइसनो  करके  अपना लेतेंव।
मैं धरती के मनखे,तैं अगास के फूल,
दूरिहा  ले  तोर  दरस  ला  पा  लेतेंव।
गजब आथे मन मा नवा-नवा बिचार,
हाँसत हन दुनो , सुग्घर सपना लेतेंव।
अँधियारी मा दीया कस तैं हर अँजोर,
बत्तर कस कीरा , मया ल लमा लेतेंव।
पुरखा   के   सपना   बंस   हमर  बाढ़े,
सावन कस आतेस, मन हरिया लेतेंव।
बलदाऊ राम साहू
मो 9407650458

Wednesday, 25 May 2016

राजनीति  हर  काजर  के  कोठी  आय,
तभो समझथे मनखे  मन, बपोती आय.

जाँगर  टोर, बोहा  पछीना  धरती  बर,
धरती ले उपजही,   हीरा -मोती आय.

सरहद म गोली खात हे, लहू बोहात हे
देस म उजियार बगरईया जोती, अाय.

पर के सँथरा घी  देख  ललचाओ झन,
परके धन  हा  तो,  माटी-गोंटी  आय.

सूट-बूट पहिरे के का  मतलब  हावय,
इज्जत ढाके बर तो बस, लँगोटी आय.

काबर  दूसर  के छाती म दार  दरत हौ,
अपन बर  सोंहारी,  सुख्खा रोटी  आय.

@बलदाऊ राम साहू
  मो 9407650458
अपन हर बीरान होगे , अब तो गाँव  मा.
लुच्चा मन सियान होगे, अब तो गाँव मा.

कपटी मन अगुवा होगे,  करथे ग नियाव.
प्रपंच  हर  ग्यान  होगे,  अब तो गाँव  मा.

सुमत संग जीयन,आस अउ बिस्वास रहय.
मितान ह बइमान होगे,  अब  तो गाँव  मा.

गुरुतुर  गोठ  नँदागे,   टेंचरही   गोठियाथे.
बानी तीर-कमान होगे,  अब तो गाँव  मा.

एक बात बने होय हे, 'बरस'  तैं  बता  दे,
छोटे-बड़े समान होगे, अब तो  गाँव मा.

@बलदाऊ राम साहू
  मो 9407650458
कोन ला बतावन  संगी, अपन ग लचारी,
देस ला लुटत हावय, नेता  अउ  बइपारी.

फेसन के जुग आगे  काला  हम  बतावन,
डोकरी मन दिखथे, फकत  अटल कुवाँरी.

कमिया मन ल मिले नहीं ठोम्हा भर पसिया,
बइठाँगुर मन  झड़कत  हें,  बरा - सोंहारी.

फोकट के चऊँर , सुसी  भर  पीओ  दारू,
घर  मा  बइठे-बइठे, सब  के  करौ  चारी.

समरथ मन ला  घुना खागे करौ ग बिचार,
भरे सभा म हारत हे, दुरपती  ल  जुआरी.

भगतसिंग कहावत हें, लुच्चा अउ लफंगा,
'बरस' बइठे गुनत  रहिथे, अपन ग दुवारी.

@बलदाऊ राम साहू
 मो 9407650458

Wednesday, 13 April 2016

बचपन की कुछ भूली-बिसरी यादों को इस तरह

बचपन मा  गजब  सैतानी करन,
खेल-खेल म हम बइमानी करन.

कोनो  चोरी  करत  धर ले हमला
छाती   तानन,   रंगदारी    करन.

खेलन,  खावन  करन मटरगस्ती,
काम-धाम म आना-कानी करन.

सगा पहुना खेल ह भावय  गजब,
बन  के  सियान,  सियानी  करन.

नइ  सुनन  दाई-ददा  के कहना,
'बरस' हमू गजब मनमानी करन.

एके  सुग्घर  वोमा   बात   राहय,
बिना भेद करे हम मितानी करन.

गाँव  सियान करे  झगरा-झंझट,
देख के हम  गजब  हैरानी करन.

लड़-झगर के मिल जाववन  कउखन,
भेदभाव  ल हम   पानी- पानी  करन.

सगा पहुना=बालपन का एक खेल, सियान=बुजूर्ग, दाई-ददा=माता-पिता, कउखन=शीघ्रतर.

@बलदाऊ राम साहू
 मो 9407650458

Saturday, 19 March 2016

आफ़ताब की क्यों शिकायत करें,
मिलजुल कर हम सब इबादत करें.

ये चाँद, तारें,  जमीं  है  यहाँ पर,
इन्हीं से सभी आज उल्फ़त  करें.

वतन के हैं दुश्मन उन्हें कहें क्या
वतन की मगर हम हिफ़ाजत करें.

दहशत के साये में कब तक जियें ,
सरों  को कटाने की  हिम्मत  करें.

गगन  में  परिंदे  उड़ें जिस  तरह,
बेडि़याँ तोड़कर अब बगावत करें.

यहाँ लोग हैं सिर्फ  मौका-परस्त ,
भला  कैसे  इनसे  मुहब्बत  करें.

स्वयं  ही  बनाएँ चलो  नए रास्ते
ईमाँ  की  राहों  में  बरकत  करें.

सयाने खफा़ हैं भला क्यूँ 'बरस’
लौटा  है   बचपन  शरारत  करें.

@बलदाऊ राम साहू

Thursday, 17 March 2016

घुप  अँधियारी  छाये   हे,  उजियारी  कर,
एकहौवा नइ सकस तब, ओरी-पारी  कर.

बीर सिपाही मन सरहद म हँस-हँस के मरथें
देस   के  खातिर  तहूँ  हर, जंग  जारी  कर.

आज उही जिथे जग म जेकर भुजा ताकत हे
सुभिमान  संग जिये के,  जम के  तैयारी कर.

पग-पग म काँटा  बगरे  हे,  रद्दा  ल चतवार,
जिनगी ल जिये बर थोरिक तो हुसियारी  कर.

कोन अइसन बस्ती जिहाँ, नइ हे सुरुज-चाँद
देख अपन ल तैं हर,  दूसर के झन चारी  कर.

@बलदाऊ राम साहू
अब  पलाश में अंगार कहाँ,
फागुनाई  अब  बयार  कहाँ.

बुझे-बुझे   लगते  हैं  चेहरे,
मुस्काता अब  संसार  कहाँ.

हो  गए  जब  अपने  पराये,
हँसी-ठिठोली वो प्यार कहाँ,

रंगहीन   हो   गई   है  होली,
उल्लास  भरा  त्योहार  कहाँ.

नहीं यहाँ अब  कृष्ण-कन्हाई,
गोपियों का निच्छल प्यार कहाँ.

'बरस'   बता  दो   जीयें  कैसे,
जीवन  का  वो  उपहार  कहाँ.

@बलदाऊ राम साहू
बिपत  म हे  संसार, का करन,
लुटत हे  ये  बजार, का  करन.

नाता- रिस्ता  सुवारथ  के  हे,
मतलब के सब  यार, का  करन.

घर - दुवार  सब  खेत  बेंचागे,
इज्जत  तार  -तार, का  करन.

मुख हर दिखथे कुलकत हावय
अंतस  म  अँधियार, का  करन.

घर  के जोरु पर-बुधनिन  होगे
'बरस' खड़े मुँह फार, का करन,

@बलदाऊ राम साहू
आजादी के अतका  साल होगे,
जनता ह कतका खुसहाल होगे.

बाड़िस भूख अउ  जबर महंगाई
मनखे के अब हाल-बेहाल होगे.

अब तो लड़ना  अउर  लड़वाना
फकत  ये   सियासी  चाल  होगे.

जउन हे कुरसी  के  आगू-पाछू
जम्मो मन  अब  मालामाल होगे.

मनखे ला सुख-दुख पूछना अब
'बरस' सबले कठिन सवाल होगे.

@बलदाऊ राम साहू
जिनके  मन में सवाल  होते हैं,
बस वही तो खुशहाल  होते  हैं।

तिनका-तिनका जोड़ा है जिसने
जग में  वो  मालामाल  होते   है।

माँ  का  मान  बढ़ाया है  जिनने
वे  ही  गुदड़ी  के लाल  होते हैं ।

समय का मान जो  किया  नहीं
सच  में  वही   कंगाल  होते  हैं ।

जब  दुख  से  होता  है  सामना
क्षण, महीने  औ' साल  होते  हैं।

@बलदाऊ राम साहू

Wednesday, 16 March 2016

एक नव गीत

चेहरे रौशन हुए
पचपनवें साल में.

बिन बुलाए आ गई है
फागुनी बयार अब
खत्म हुई दूरियाँ
ढह गई दीवारें सब
बज रहे हैं ढोल अब
मन की चौपाल में.

ठहर गए हैं पाँव अब
निहारने पलाश को
बौराये आम तले
जगाने विश्वास को
सपने संजो रहे हैं
अनुत्तरित सवाल में.

अनजानी हवाएँ जब
मन को झकझोंरतीं
गीतों में छंद बन
भावों को हिलोरतीं
तन-मन डूब गया
यौवनी खयाल में.

@बलदाऊ राम साहू
क्यों  बैठे  हो मौन, बता दो  बापू  के  बंदर,
अपनी  मंशा हमें  जता  दो  बापू  के  बंदर।

बात-बात में लोग यहाँ पर आग लगा जाते हैं
उच्छृंखलता से मुक्ति दिला दो बापू के  बंदर।

बिना राजधर्म को  जाने  नारे  लगा  रहे  हैं,
इनके  भीतर भाव जगा  दो  बापू  के  बंदर।

ज्ञानी, ध्यानी, संत, महाजन अपने को बतलाते,
अज्ञानियों  को  राह  बता दो बापू के बंदर।

वतन  बेचने  को  तत्पर  हैं  ये सब मूढ़मति,
मातृभूमि  की  आन  बचा  दो  बापू के बंदर।

जात-धर्म  इनकी  रोटी  है, कुटिलता पुलाव,
भाईचारे का मरम  बता  दो  बापू  के  बंदर।

बेशर्मी की  हद  हो  गई अपनी हाँक  रहे हैं,
मर्यादा का  अर्थ लखा  दो  बापू  के  बंदर।

'बरस’ केवल चिंता करता है निष्ठुर हैं सब लोग
उनके  भीतर  जोत जला  दो  बापू  के बंदर।

@बलदाऊ राम साहू
रद्दा म एकझन पहिचान दिखिस,
पक्का  वोहर  बेईमान   दिखिस.

गोठियाईस  वोहर  मीठ -मीठ,
लबरा  मोला   मितान  दिखिस.

सुवारथ खातिर  ईमान बेचईया,
मनखे रूप म  शैतान  दिखिस.

हमर पीठ   म   छूरा  गोभईया,
मोला  वो  पाकिस्तान  दिखिस.

एके   दाई   के    पेट   उपजेन,
वो भाई कइसे अनजान दिखिस.

@बलदाऊ राम साहू
अपन  हाथ  तलवार  राख,
जमगरहा बने धारदार राख.

दुस्मन के संग लड़ना हे तब
एक एक  नहीं  हजार  राख.

कोनो बैरी झन सिर उठाये,
मन  म  ठोस  बिचार राख.

अपन उप्पर कर ले भरोसा,
दूसर  के झन आधार राख.

जिनगी म कतको बोदरा हे,
'बरस' तैं हर सार-सार राख.

राख=रखें,  जमगरहा=वजनदार/मजबूत,  झन=मत, म=में, बोदरा=अधपके अनाज के दाने(सारहीन तत्व)
@बलदाऊ राम साहू
9407650458
[13:40, 3/15/2016] B R Sahu:

आफ़ताब की क्यों शिकायत करें,
मिलजुल कर हम सब इबादत करें.

ये चाँद, तारें,  जमीं  है  यहाँ पर,
इन्हीं से सभी आज उल्फ़त  करें.

वतन के हैं दुश्मन उन्हें कहें क्या
वतन की मगर हम हिफ़ाजत करें.

दहशत के साये में कब तक जियें ,
सरों  को कटाने की  हिम्मत  करें.

गगन  में  परिंदे  उड़ें जिस  तरह,
बेडि़याँ तोड़कर अब बगावत करें.

यहाँ लोग हैं सिर्फ  मौका-परस्त ,
भला  कैसे  इनसे  मुहब्बत  करें.

स्वयं  ही  बनाएँ चलो  नए रास्ते
ईमाँ  की  राहों  में  बरकत  करें.

सयाने खफा़ हैं भला क्यूँ 'बरस’
लौटा  है   बचपन  शरारत  करें.

@बलदाऊ राम साहू
[12:07, 3/16/2016] B R Sahu:

आज मेरे गाँव में

अपने पराये हुए आज मेरे गाँव में.

उजड़ गए खेत सभी सूना खलिहान है
बूढे़ं सब  मुर्ख  हुए  छोकरे  सुजान  हैं
छाले तो दिखते नहीं अब किसी के पाँव में.
आज मेरे गाँव में.

ठहर गया पनघट़ घठौदें और घाट अब
खेमों में बँट रहे हैं तेली और जाट सब
उलझा-सा लगता है सब सियासी दाँव में.
आज मेरे गाँव में.

खेल और खिलौनों से सब रिश्ते टूट गए
लगता है बच्चों से घर-आँगन  रूठ गए
बचपन तो दिखता नहीं बरगद की छाँव में.
आज मेरे गाँव में.

आँगन में चिड़िया अब गीत नहीं गाती है
रधिया और बुधिया अब रीमेक सुनाती हैं
कोयल-स्वर मौन  है कौवों  की काँव  में.
आज मेरे गाँव में.

@बलदाऊ राम साहू