छाती अड़ाना आ गया है
पतझरों का अब ज़माना आ गया है।
रूप हमको नव बनाना आ गया है।
कब तलक हम मौन हो बैठे रहते
अब हमें भी मुस्कुराना आ गया है।
डर रही हैं अब स्वयं रातें अँधेरी
देख लो, सूरज उगाना आ गया है।
व्यर्थ हमको जो चिढ़ाते में लगे थे
आईना उनको दिखाना आ गया है।
वो कबूतर लौट आया है 'बरस' फिर,
जानकर छाती अड़ाना आ गया है।
-बलदाऊ राम साहू
दुर्ग, छत्तीसगढ़
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