Friday, 14 October 2016

नवगीत

जिसे देखिए वही राह में
काँटे बोते हैं

भाई का भाई से अनबन
भौजाई तो हुई पराई
और पड़ोसी सब लगते हैं
पूरे  निर्दयी कसाई
दुनिया की ये रीत देखकर
हम तो रोते हैं

पैसों से ही तौले जाते हैं
रिश्तों की गहराई
मान, प्रतिष्ठा और पद की
होती है खूब बड़ाई
कुंठाओं की विष-बेलें
खुद ही बोते हैं.

संबंधों के बीचोंबीच अब
स्वार्थ पनपते हैं
अपने ही  सब सगे-संबंधी
बैरी लगते हैं
अनचाहे संबंधों का ही
बोझ सदा  ढोते हैं

-बलदाऊ राम साहू
 मो 9407650458

Thursday, 13 October 2016

ग़ज़ल

               भाव नया जगाना है

धीरे-धीरे  भीग  रहा  है  माँ   का  आँचल  आँसू  से,
पर बेटे  को  याद  कहाँ  है मन  उनका  बहलाना  है.

जंगल,  धरती,  झाड़-झरुखे  झुलस  रहे  अंगारों  से,
फिर भी दुश्मन सूरज कहता, इनको अब बतलाना है.

ओठ  चबाते  चट्टानों पर बैठा कोई   दुखिया  लगता,
उसके  भीतर  जज्बातों  का  भाव  नया  जगाना   है.

शोषण औ' संघर्षो की गाथाओं  से इतिहास  भरा है,
अब  अपने हक का  उसमें  अध्याय नया  लगाना  है.

भीतर में जो आग दबी थी धुआँ धुआँ-सा लगता  था,
उसको देकर हवा जरा- सी फिर से अब  भड़काना  है.

एक कबूतर  चिट्ठी  लेकर  सरहद  के  उस  पार  गया,
सरहद पार बैठे  हैं  कातिल  यह  उसको  समझाना  है.

@बलदाऊ राम साहू
  मो 9407650458

Monday, 3 October 2016

ग़ज़ल
आदमी को असहाय बनाती है गरीबी

आदमी को  असहाय  बनाती  है  गरीबी,
मौत का अहसास भी  कराती  है  गरीबी.

सो  रहा  है  चूल्हा  भी  हाँडी  उपास  है
राह  ये  पतन   की   दिखाती  है  गरीबी.

दिन भर संघर्ष की जो गाथा बहुत लिखी
रात   में   दर्द   को   दुहराती   है   गरीबी.

मान और अपमान में अब फर्क कहाँ रहा,
खून  का   घूँट  हमें   पिलाती   है   गरीबी.

जीतने का जज़्बा हममें  बहुत है  लेकिन,
जीत  में भी  हार  को  दिखाती  है गरीबी.

पाप  और  पुण्य  की  उलझनें  हैं  बहुत,
इंसाँ  को  शर्मसार  कर  जाती है  गरीबी

डूबने  के डर  से क्यूँ  बैठा  है  तू  ’बरस’
आदमी  को   इंसान   बनाती  है  गरीबी.

@बलदाऊ राम साहू
 मो 9407650458