Sunday, 4 June 2017
धूप और खछाँव-सी जिंदगी
कौवों की काँव-सी जिंदगी,फटे हुए पाँव - सी जिंदगी.
खुशियों की मेघ कैसे लाएँ,
धूप और छाँव-सी जिंदगी.
अंतस के भाव कहीं खो गए,
है 'सियासी दाँव-सी जिंदगी.
रिश्तों में अब कहाँ मिठास है,
उजड़े हुए गाँव-सी जिंदगी.
हाथों से छिनता पतवार अब
लड़खड़ाती नाव-सी जिंदगी.
बलदाऊ राम साहू
9407650458
Tuesday, 16 May 2017
निर्लज्ज मानव काट रहे हैं
आपस में बतिया रहे हैं
महुआ, जामुन, आम
पर्वत उजड़े, नदियाँ सूखी
चिंतित हैं आवाम.
बूढ़ा बरगद सोच रहा
दुखड़ा किसे सुनाएँ
जिनको हम छाया देते
वही हुए पराये
चिमनी धुआँ उगल रही
दिन बीते कैसे राम.
निर्लज्ज मानव काट रहे हैं
हरे-भरे सब पेड़
खेतों की गोद सूनी
विधवा लगती मेड़
अब इनको समझायें कैसे
कैसे दें पैगाम.
नेता अफसर लगा रहे
फाईलों में बाग
इसीलिए सूरज बरसाता
आसमान से आग
बूँद-बूँद पानी को तरसे
जीना हुआ हराम.
_बलदाऊ राम साहू
9407650458
न पीपल, न बरगद है
न जामुन की छाँव रे,
तपते अंगारों से
जलते हैं पाँव रे।
सूख गई नदियाँ और
झरने भी सूख गए,
घाट और घरौंदों से,
रिश्ते भी टूट गए।
अब कहाँ होती है,
हँसी और ठिठोली।
माथे में बिंदिया,
वो पैरों की रोली।
ठुमकते हैं अब कहाँ,
पनिहारिन के पाँव रे।
दूर कहीं जंगल से,
गीत नहीं आते हैं।
चरवाहे भी अब कहाँ,
बाँसुरी बजाते हैं। ०
सूनी है गलियाँ और,
सूना चौपाल है।
अब कौन पूछता,
अपनों का,क्या हाल है।
पराया-सा लगता है,
अपना ही गाँव रे।
अब कहाँ सजता है
अपना खलिहान रे।
सपनों में जीता है
अब तो किसान रे।
बातों के धनी हैं,
और भाषण में महान
अंतस को देखो तो
खुद से अंजान
कहने को गाँव अपना
पर नहीं है ठाँव रे।
-बलदाऊ राम साहू
9407650458l
माँओं का इतिहास
दुनिया में सबसे अच्छा है
माँओं का इतिहास।
ममता भरा हाथ हमेशा
सिर पर वह रखती हैं
स्नेह भाव से सराबोर वह
कभी नहीं थकती है
सबने देखा, समझा किसने
माँओं का अनुराग
सबसे अनुपम होता हैं
उनका हर एक त्याग।
कभी नहीं खोती है वह
अपने मन का विश्वास।
खालीपन भरने में वह तो
सक्षम होती है
बच्चों के सुख में हँसती है
दुख में रोती है
प्यार पाने को देव माँओं का
शिशु बन जाते हैं
उनके आह्वानों पर वे
झटपट ही आते हैं।
माताओं के नेह पर टिका है
धरती और आकाश।
छोटों और बड़ों के बीच वह,
कड़ियाँ बन जाती हैं
बुझती बाती में आशा का
भाव जगाती हैं।
सबके अंतर-भावों को
यूँ ही पढ़ लेती है
समभाव से जीने की वह
सीख हमें देती है।
जीवन के इस छंदशास्त्र में
माँ होती है अनुप्रास।
बलदाऊ राम साहू
मो.न.- 9407650458
Tuesday, 24 January 2017
सातो दिन इतवार बना दे मोर राम जी
हर दिन ला तिवहार बना दे मोर राम जी,
सातो दिन इतवार बना दे मोर राम जी.
मन काकरो नइ लागत हे काम-धाम मा,
ठलहा ला सरदार बना दे मोर राम जी.
इक दुसर के टाँग खींचें मा गजब मजा हे,
दुनिया ला मक्कार बना दे मोर राम जी,
लड़व-झगरव माथा फोरव भाई भाई के,
अँगना मा दीवार बना दे मोर राम जी.
भाग भरोसा जिनगी जीथे मनखे मन हर,
उनला तैं बेकार बना दे मोर राम जी.
बलदाऊ राम साहू
9407650458
Monday, 23 January 2017
Sunday, 22 January 2017
सत्ता के रखवाले हमें बताओ तो
सत्ता के रखवाले हमें बताओ तो
किनके धन है काले हमें बताओ तो.
स्विस बैंक में किसके कितने खाते हैं,
राज़ छुपाने वाले हमें बताओ तो,
संसद के भीतर में क्या-क्या होता है
कौन हैं किनके साले हमें बताओ तो.
पानी पर भी राजनीति करने वालो
किनकी नदियाँ-नाले हमें बताओ तो.
तौर-तरीके़ अपने ज़रा बदल देखो,
पीछे चलने वाले हमें बताओ तो.
सताये गए जो उन्हें हौसला दे,
सताये गए जो उन्हें हौसला दे
सुलगती हुई आग को तू हवा दे.
ज़माने के क़िस्से बहुत पोथियों में,
पन्ने पलट कर उन्हें बस पढ़ा दे.
कँटीली डगर से डरे आदमी को,
नज़दीक मंजिल है रास्ता दिखा दे.
मकसद पता ही नहीं ज़िंदगी का
कदम यूँ न भटके, खुदा आसरा दे.
वो सवाल पर सवाल करता रहा है,
जवाब उन सवालों के कोई बता दे.
बलदाऊ राम साहू
9407650458
अलग-अलग भूगोल कबीरा बोल ज़रा.
अलग-अलग भूगोल कबीरा बोल ज़रा,
सबकी परतें खोल कबीरा बोल ज़रा,
सच्चाई का मोल कहाँ है दुनिया में,
सबकी भीतर पोल कबीरा बोल ज़रा,
चेहरों पर नकाब लगाए दिखते हैं, .
सच्चे दिल अनमोल कबीरा बोल ज़रा,
भव सागर में फँसे हुए हैं लोग सभी.
आँखें उनकी खोल कबीरा बोल ज़रा,
धर्म के पुतले बैठे हैं चोला पहने,
नीयत डाँवा-डोल कबीरा बोल ज़रा,
घर-घर में ताले हैं पहरेदारी है,
अंतस का पट खोल कबीरा बोल ज़रा.
इंसानों में भेद कहाँ कर पाते हैं,
ढोल के अंदर पोल कबीरा बोल ज़रा.
@बलदाऊ राम साहू
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