Wednesday, 16 March 2016

एक नव गीत

चेहरे रौशन हुए
पचपनवें साल में.

बिन बुलाए आ गई है
फागुनी बयार अब
खत्म हुई दूरियाँ
ढह गई दीवारें सब
बज रहे हैं ढोल अब
मन की चौपाल में.

ठहर गए हैं पाँव अब
निहारने पलाश को
बौराये आम तले
जगाने विश्वास को
सपने संजो रहे हैं
अनुत्तरित सवाल में.

अनजानी हवाएँ जब
मन को झकझोंरतीं
गीतों में छंद बन
भावों को हिलोरतीं
तन-मन डूब गया
यौवनी खयाल में.

@बलदाऊ राम साहू

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