Tuesday, 9 September 2014

बोलना मना है दोस्तों। 


है दाँत मगर, अब नहीं चना है दोस्तों,
बातें बहुत हैं, बोलना मना है दोस्तों।

चंदा की चाँदनी तो रात में है आज भी,
है अंधियारा, बादल घना है दोस्तों।

नहीं है कोई कातिल कहता है जमाना,
हरेक  हाथ खून से सना है दोस्तों।

पाने के लिए मंजिल निकले हुए हैं लोग
वो रास्ता मगर नहीं बना है दोस्तों।

झुकने लगी है रीढ़, जमाने की अब मगर,
ये आदमी बिना वजह, तना है दोस्तों।

मिलते नहीं हैं लोग बहुत भीड़ है यहाँ,
अब हैसियत पहचानना मना है दोस्तों।

Monday, 8 September 2014

चिडि़या



चिडि़या चुन-चुन तिनके लाती,
फिर उनसे वह नीड बनाती।

रोज सजाती सुंदर सपने 
बैठ घोसले में वह अपने।

बच्चों का होगा संसार
खूब करूँगी उनसे प्यार ।

दाने चुन-चुनकर लाऊँगी
स्वयं उन्हें मैं चुगवाऊँगी।


फिर वे डैने फैलाएँगे
अंबर में उड़-उड़ जाएँगे।

Saturday, 6 September 2014

उठो-उठो
                    


 मुर्गा बोला उठो-उठो तुम, उठो-उठो
प्रथम पहर है, उठो दिवस अब आया,
बुला रही है प्रात पवन अब उठो-उठो
चिडि़यों ने मधुर-मधुर है गीत सुनाया।

उठो-उठो अब बुला रहे हैं वृक्ष-लताएँ
जाग गया हैं यह जग सारा उठो-उठो।
उठो-उठो सूरज ने बाँहें फैला दी हैं
कितने करने काम अनोखे उठो-उठो।

कृषक बैल को हाँक रहा है, उठो-उठो
अवसर तुम से भाग रहा उठो-उठो।
भर लेना जीवन में खुशियाँ विश्राम नहीं
जीवन का उत्कर्ष आ गया उठो-उठो।

कठिन राह को सरल बनाने उठो-उठो
नव प्रात में भाग्य सजाने उठो-उठो
उठो उठो हर स्पंदन में आशाएँ हैं
जीवन को उत्सव मय करने उठो-उठो।

Friday, 5 September 2014

गिरगिट की तरह रंग बदलता है आदमी

गिरगिट की तरह रंग बदलता है आदमी,
सांपों-सा आस्तीन में पलता है आदमी ।

वो है रंगा सियार कहानी में जो रहा,
चालें भी लोमड़ी-सी चलता है आदमी।

जिस डाल पे बैठा है उसे काटता है वो,
अपने किए पे हाथ फिर मलता है आदमी।

पा तो लिया महारत, वो दुम हिलाने में
फिर भी यहाँ वहाँ पे उछलता है आदमी।

मुँह खून से सना है देखो जरा उसे,
गिद्धों की बस्तियों में पलता है आदमी।

कर ली है दोस्ती भी उसने अंधेरे से
सूरज से सुबह के भी जलता है आदमी।

बहुरूपियों का रूप धर लिया है उसी ने,
खुद को न जाने क्यूँ अब छलता है आदमी।


सूरज को दिया दिन में दिखाने लगा है वो,
हर रोज व्यर्थ मोम सा गलता है आदमी।

Tuesday, 2 September 2014

बेटियाँ पढ़ेंगी

बेटियाँ पढ़ेंगी
इतिहास वो गढ़ेंगी
विकास की सौ-सौ
सीढि़याँ चढ़ेंगी।

कदम-कदम मिलाकर 
नाप नए रास्ते
देश के भविष्य को
संवारती चलेंगी।

एक नए सूरज-सा
तमस को मिटाकर
नव प्रभात की, वो
रोशनी बनेंगी।

युग नया आएगा
ऐसा संकल्प है
आसमां छुने के
सपने बुनेंगी।
बंधनों को तोड़कर
मुक्त गगन में 
पंख फैलकर 
निर्भय उड़ेंगी।

तपकर ही सोना 
कुंदन कहलाता है,
साँचे में ढलकर 
गहने वो बनेंगी।


रिश्तों का अहसास 

धरती प्यासी रह गई, रूठा जब आकाश।
क्यूँ फीका-सा लग रहा, रिश्तों का अहसास।

छीन लिया बाजार ने, गाँवों के वो भाव।
पत्थर बनता शहर है, बचा न कुछ भी पास।

जंजीरों से बँधी हुई, बेटी का संसार। 
जोह रही है बाट वो, मन में लेकर आस।

भाषण से वे नापते, लोगों के ज़ज़्बात।
विज्ञापन-सा लग रहा, अपनों का विष्वास।

पंछी कब आकाष में, उड़ पाते उन्मुक्त।
छुपकर बैठे बहेलिये, उनके ही आवास।

कंधों पर हल था कभी, उन पर अब बंदुक।
धरती की आँखें सजल, ओंठों पर है प्यास।


बेटे ने बनवा लिया, अपना इक संसार।
गुमसुम बूढ़ा बाप है, मां का हृदय उदास।

गली-गली में चल रहा , सपनों का व्यापार।
घीसू अब भी कर रहा, एक जुनिया उपवास।

Tuesday, 3 June 2014

अच्छे दिन आयंगे

आदिम जाति अनुसूचित जाति विकास विभाग द्वारा विज्ञान शिक्षा को प्रोन्नत करने के लिए  नई पहल की है। यह पहल उच्च प्राथमिक कक्षाओं में अध्ययनरत बच्चों में वैज्ञानिक सोच विकसित करने के लिए है।  विभाग का मानना है कि हमारे आसपास में विज्ञान के बहुत से तत्व है। यदि बच्चों में देखने की नजरिया विकसित कर दें तो वै अपने आसपास के ज्ञान को बेहतर ढ़ग से समझ पाएंगे। और उन्हें पाठ्यक्रम के विज्ञान को समझने में सहायता मिलेगी। इस काम को बढ़ाया जाये तो इसका अच्छा प्रतिफल मिलेगा।

Friday, 30 May 2014

चूहों का बिल और औरतों का दिल

चूहों का बिल और औरतों का दिल

एक दिन मेरे पुराने मित्र प्रधान जी ने मुझसे नाराज़गी व्यक्त करते हुए कहा, साहू जी, आप कुछ भी सोचते हैं, कुछ भी लिखते हैं और कुछ भी बोल देते हैं। यह बात अलग है कि हम आपका सम्मान करते हैं, इसलिए ये बातें शालीन भाषा में कह रहें हैं अन्यथा कोई दूसरा होता तो कह देता कि कुछ भी बकते हो, यह आपको अच्छा नहीं लगता।
बिना संदर्भ के कही गई बातें मुझे समझ नर्हीं आइं, मैंने स्पष्टीकरण चाहते हुए कहा, ‘‘प्रधान जी, मैंने कुछ समझा नहीं।’’
इसमें समझने की क्या बात है? कभी तो आप मनुष्य को कुत्ते और कभी कुत्तों को मनुष्य से बेहतर बता देते हैं। अब आपने नया बखेडा खड़ा कर दिया है। ‘‘चूहों का बिल और औरतों का दिल कहकर।’’ है न यह बेतुकी बातें?
प्रधान जी की नाराजगी मुझे समझ में आ गई। उनका दिल मेरी व्यंग्य रचना से आहत हुआ था। वे बिलकुल भी सहमत नहीं थे, कुत्ते की तुलना मनुष्य से की जाए। उनका मानना था कि कुत्ते हमेशा मनुष्य से अब तक बेहतर ही साबित हुए हैं। वे कहना चाहते थे कि मनुष्य चैंसठ योनियों की यात्रा करके अपने समस्त पापों का प्रायश्चित करके पृथ्वी पर आता है, किंतु न जाने कुत्ते कितनी योनियों में जन्म लेने के पश्चात् इस अनोखे स्वरूप को प्राप्त करते हंै। वे चाहते थे कि मनुष्य को मनुष्य रहने दें और कुत्ते को कुत्ते। दोनों की तुलना कदाचित उचित नहीं है।
मैंने प्रधान जी से कहा, भाई प्रधान जी, आप व्यंग्य विधा के अच्छे जानकार हैं आपने तो भारत भर के श्रेष्ठ व्यंग्यकारों का सान्निध्य प्राप्त किया है इसलिए आप व्यंग्य के मर्म को मुझसे बेहतर समझते हैं। महासमुंद में रहते हुए आप लतिफ घोंघी जैसे वरिष्ट व्यंग्यकार के स्नेह पात्र रहे हैं।
प्रधान जी मेरे इस तर्क से भी सहमत नहीं हुए और पुनः खीसते हुए बोले, ‘‘इसका मतलब यह नहीं कि आप व्यंग्य को अपव्यंग्य कर दें। व्यंग्य के माध्यम से किसी विशेष प्राणी को अपमानित करना व्यंग्यकारों का दायित्व नहीं है। आप मनुष्य जैसे निकृष्ट जीव की तुलना कुत्ते जैसे श्रेष्ठ जीवों से नहीं कर सकते। आपने यह तुलना करके उनकी स्वामिभक्ति का अपमान किया है कुत्ते जैसा स्वामी भक्त तो मनुष्य कभी नहीं रहा है। मनुष्यों के बारे में यह उक्ति सदैव प्रचलित रही है कि वे जिस पत्तल में खाते हैं, उसी में छेद करते हैं। फिर यह नया विषय चूहों का बिल और औरतों का दिल आपकी फितरती दिमाग में कैसे आया ?’’
मैंने कहा, ‘‘प्रधान जी मेरा चिंतन तो कालिदास की भाँति है। जैसे कालिदास ने रघुवंश की रचना करते हुए कहा कि मेरे पूर्वज कवियों ने राम के बारे में कह कर मणि में छेद किया है और मैं तो उसमें धागा पिरोकर केवल माला बनाने का काम कर रहा हँू। वैसे ही हमारे पूर्ववर्ती व्यंग्यकारों ने इन विषयों पर बहुत मार्मिक ढंग से अनेक वृत्तांत दिए हैं। फिर आपने भी अपने यौवनकाल में यह अनुभूति की होगी कि औरतों के दिल में प्रवेश करना कितना कठिन कार्य होता है। जैसे चूहों को पहाड़, पर्वत, चट्टानों में बिल बनाने के लिए कठिन परिश्रम करना होता है, उसी प्रकार पुरुषों को भी औरतों के दिल में स्थान बनाने के लिए न जाने कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं। मेरा अनुभव तो इस मामले में बड़ा खराब रहा है। अपने यौवनकाल से इस प्रौढ़ावस्था के आते तक न जाने कितने ही नवयौवनाओं, अभिसारिकाओं और प्रौढ़ाओं के दिल में कोशिश की है, किंतु कभी भी अपेक्षित सफलता नहीं मिली है। असफलता का स्वाद चखते-चखते मुझमें निराशा के भाव आ गए हैं। बेचारी पत्नी को तो परवश होकर दिल देना पड़ा यदि अरेंज मैरिज नहीं होती, शायद उसके दिल में स्थान बना भी पाता या नहीं, यह नहीं कह सकता।
मेरे इस तर्क से प्रधान जी का क्रोध कुछ शांत हुआ। उन्हें लगने लगा कि सही में चूहों के लिए बिल बनाना जितना मुश्किल है उससे ज्यादा मुश्किल पत्थर दिल औरतों के दिल में स्थान बनाना है। उन्होंने मुझे इस विषय पर समाज को विचार देने के लिए साधुवाद देते हुए कहा कि साहू भाई, आपने तो मेरी सुषुप्ता अरमां को जगा दिया। बीते हुए कल को याद करता हँू, तो आज भी मेरी आँखों से आँंसू टपक पड़ते हैं। मुझे समझ नहीं आता कि क्यों कवियों ने पत्थर दिल औरतों को कोमलांगी और कोमल हृदया कहा होगा? यह कहते हुए उनकी आँखें नम हो गई।

Wednesday, 28 May 2014

बस्तर के जंगलों में
      1.
बस्तर के जंगलों में
डोंगरी-पहाड़ों में
कंटिले पेड़ उग आए हैं
जिसमें लग हुए हैं रक्तिम फूल,
ललचाए हुए
मत जाना उनके पास  
नहीं तो, उसमें लगे
नुकीले काँटें
तुम्हें कर देंगे जख्मी
तुम हो जाओगे लहुलुहान
और तुम्हारे पास
आँसू बहाने के अतिरिक्त
कुछ भी शेष न रह जाएगा ।
      2.
मौत
नदी किनारे
रेंग रही है, कतारबद्ध
पहरेदारों की तरह
तुम नदी के उस पार
कैसे जा सकते हो ?
क्योंकि मल्लाहों ने
पतवार को रख दी है गिरवी
मौत के पास।

      3.
हर जगह बैठे हैं
जहरीले साँप फन फैलाए,
और सिर के उपर
मंडरा रहे हैं गिद्ध
लगता है हर जगह
मौत का पहरा है
क्योंकि उजाले ने
कर लिया है समझौता
अंधेरों के साथ।
4.
जंगल ने लिख दी है
एक चिट्ठी
खून से
शांति कहीं खो गई है
मत करना रिपोर्ट थानों में
और न ही
खोजने की कोशिश करना
वरना तुम भी
कही खो जाओगे
बिहड़ में।

आहत

आहत

आज रविवार का दिन है। सुबह के आठ बज रहे होंगे। अब तक घर के सभी लोग सो रहे हैं, पर बाबा अपनी नियमित दिनचर्या के अनुसार सुबह पाँच बजे से जाग गए हैं। सुबह आठ बजे तक लोगों को सोते देखकर उनके मन में कुढ़न-सी होती है, पर बूढ़ा व्यक्ति कर भी क्या सकता है? अपनी बेचारगी में जीना उसकी मजबूरी है। एक समय था कि उनकी एक आवाज से पूरा घर हिल जाता था। लोग उनके क्रोध से बचने के लिए तरकीब सोचते रहते थे, पर वही आज निरीह और दया के पात्र हो गए हैं। यह कैसी बिडंबना है कि समय के साथ व्यक्ति अपना महत्व खो देता है!
बाबा को आज क्रोध आ रहा है, क्रोध का कारण उनको सुबह की चाय का न मिलना है। वे प्रतिदिन सुबह सात बजे तक मार्निंगवाॅक करके लौट आते हैं और चाय की प्रतीक्षा करते रहते हैं। रोज तो कोई न कोई एक कप चाय लाकर दे देता है, परंतु आज अवकाश का दिन होने के कारण सभी सोए हुए हैं। पहले जब उनका स्वास्थ्य ठीक होता था, तब वे खुद ही एक कप चाय बनाकर पी लिया करते थ,े किंतु अब उनसे यह नहीं होता। बढ़ती उम्र निश्चय ही कई समस्याएँ स्वयं ले आती है। बाबा उसी से परास्त हैं।
उन्हें आज राधिका की बड़ी याद आ रही है। राधिका उनकी पत्नी थी। वह जब तक जीवित रही, उन्हें किसी बात की चिंता नहीं होती थी। वे खुद कितनी ही मुसीबत में क्यों न हो, पर उनका खयाल जरूर रखती थी। जीवन के अंतिम दिनों में जब वह चारपाई पर थी, तब भी उनकी चिंता किया करती थी। खाट पर से ही चिल्लाकर लोगों से उनकी आवश्यकता की सामग्री ला देने के लिए कहा करती थी।
राधिका जब से उनकी जिंदगी में आई थी, तब से उन्हें न खाने-पीने की और न ही किसी अन्य बात की परेशानी हुई। वे उनका पूरा ध्यान रखती थी। हाँ, यह जरूर है कि जब बच्चे हुए थे, तब कभी-कभी उससे कुछ चूक हो जाती थी, फिर भी वे कैसे भी समय निकालकर उनका ध्यान रखती थी। हर समय उनकी चिंता करती थी। आज ऐसी पत्नियाँ कहाँ मिलती हैं। अब तो लोग केवल अधिकार की बातें करते हैं। बात-बात में लड़ने के लिए तत्पर हो जाते हैं। कभी अपने दायित्व के बारे में सोचे भी नहीं। छोटी-छोटी बातों पर पति-पत्नी का कोर्ट कचहरी जाना तो आम बात हो गई है।
राधिका की याद आते ही बाबा की आँखों में आँसू छल-छला पड़े। वे अपनी नम आँखों को धोती की कोर से पोंछ ही रहे थे कि मुनिया उठकर अंगड़ाई लेती हुई बाथरूम जाने के लिए वहाँ आ गई। उसने देखा, बाबा गुमसुम बैठे हुए हैं और उनकी आँखें नम हंै। वह बाथरूम की ओर न जाकर उनके पास चली आई।
उसने कहा ‘‘बाबा कुछ बात है?’’
‘‘नहीं बेटा।’’
‘‘कुछ तो जरूर है, यूँ ही आप गुमसुम नहीं बैठते।’’
‘‘नहीं बेटा, तुम जाओ, फ्रेश हो आओ।’’
‘‘बाबा, चाय ला दूँ।‘‘ यह कहते हुए मुनिया बाथरूम की ओर चली गई।’’
मुनिया बाबा के छोटे बेटे विपुल की इकलौती बेटी है। वह अभी कक्षा आठवीं में पढ़ती है। राधिका के जाने के बाद वही उनका ध्यान रखती है। जब भी वह कहीं से आती है, एक बार उनके कमरे की ओर अवश्य ही झाँक लेती हंै और जब वे कमरे में होते हैं, तो उनसे पूछ लेती है, बाबा कुछ चाहिए? अब वह बाबा के अकेलेपन का सहारा बन गई है। मुनिया का इस तरह आना और उनसे दो-चार बातें कर लेना, उन्हें इस घर में किसी अपपने के होने का अहसास कराते हैं, वरना इस घर में उनका कौन है? वृद्ध व्यक्ति सड़े हुए फल की तरह अनुपयोगी होते हैं।
दो-दो बहुएँ हैं, केवल कहने के लिए। एक लोटा पानी रखने के लिए भी कहना पड़ता है। वे रात में सोने के समय अपने से एक लोटा पानी भी लाकर नहीं दे सकतीं। जबकि उन्हें यह मालूम है कि बाबा को रात में पीने के लिए पानी की जरूरत होती है। पहले तो वे स्वयं ही किचन से पानी ले लेते थे, पर अब उन्हें किचन में जाने का मन नहीं होता। इस तरह बचपन से लेकर इस बुढ़ापे तक बीते दिनों की एक-एक बात उन्हें याद आने लगी और वे अपने अतीत में खो गए।
इस परिवार को समृद्ध बनाने के लिए उन्होंने क्या नहीं किया। अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। अपनी सारी इच्छाओं की इसलिए बलि दे दी कि परिवार का कल सुखद होगा। उनके बच्चे खुशहाल होगेें। कोई यह न कहे कि उन्होंने अपने बच्चों के लिए कुछ नहीं किया। युवावस्था में किसका मन सुविधाओं का उपभोग करने के लिए नहीं ललचाता। पर बाबा ने अपनी सारी इच्छाओं की तिलांजलि यँू दे दी कि इनका उनके जीवन में कोई स्थान ही नहीं है। उनके जिस साथी ने साथ में जाॅब शुरू किया था आज उनकी क्या स्थिति है, बहुतों के पास तो रहने के लिए एक छत भी नहीं है।
बाबा की तंद्रा टूटी, तो मुनिया चाय लेकर खड़ी थी। उसने बाबा को विचारमग्न देखकर चाय टी-टेबल पर रख दी और उनके कंधे पर सिर टिकाकर बैठ गई। मुनिया समझ रही थी कि बाबा आज किसी उलझन में हैं। मुनिया का इस तरह कंधे पर सिर टिकाकर बैठ जाना उन्हें अच्छा लगा। वे चाहते भी थे कि कोई उनके पास आकर बैठे, उनसे बातें करें, पर आज किसके पास इतना समय है कि एक वृद्ध व्यक्ति से दो-चार बातें कर ले।
जब बेटों के साथ ही बहुओं ने भी नौकरी करना शुरू किया, तब बाबा कितने गर्व से सबसे कहते थे, मेरी बहुएँ भी जाॅब करती हैं। उन्हें क्या मालूम था कि उनका जाॅब करना उनके बुढ़ापे के लिए एकाकीपन का कारण बन जाएगा। सुबह तैयार होकर जब सब अपने-अपने जाॅब के लिए निकल जाते हैं, बच्चें स्कूल चल देते हैं, तब बस रह जाता है तो यह सूना घर और बाबा का एकाकीपन। जब राधिका थी, तब वे एक दूसरे से बातें करके कुछ गुत्थियाँ सुलझा लिया करते थे। आपस में बैठकर दो-चार बातें हो जाती थी, मन हल्का हो जाता था। अब तो समय काटे नहीं कटता। आदमी सोए भी तो कितना? इस बुढ़ापे में नींद भी तो रूठ जाती है।
बड़ी बहू तैयार होकर नौ बजे किचन में गई। बच्चे भी उठकर मुँह धोकर तैयार हैं। उन्हें तो आज संडे स्पेशल की प्रतीक्षा है। हर रविवार को कुछ न कुछ स्पेशल जरूर बनता है। इसलिए बच्चों को रविवार के नाश्ते का इंतजार रहता है। वैसे रविवार के दिन का नाश्ता बच्चों की फरमाईश के आधार पर ही तय होता है। आज छोटकू की फरमाईश पर छोले-भटूरे तैयार होना है। इसलिए वह बार-बार मना करने पर भी किचन में डटा है। बड़ी बहू ने खीजते हुए कहा, ‘‘नाश्ता बन जाने पर सबसे पहले तुम्हें मिल जाएगा। तुम अभी जाओ।’’ फिर भी वह किचन में अड़ा रहा। वह जानता था कि बड़ी बहू उससे बहुत प्यार करती है। कई बार तो उन्होंने उनका पक्ष लेते हुए उनके बड़े भाई-बहनों को डाँटा भी है। बच्चों मन का ही कुछ ऐसा होता है कि वे थोडे में ही ललचा जाते हैं और थोडे में अघा जाते हैं। छोटकू का किचन में डटा रहना इसी बात का प्रमाण है।
नाश्ता बनते ही बड़ी बहु ने मुनिया को आवाज दी कि वो बाबा को नाश्ता दे दे। मुनिया जब बाबा के कमरे में गई, तब वे वहाँ नहीं थे। वह नाश्ता लेकर लौट आई। मुनिया को नाश्ता लेकर लौटते देखकर बड़ी बहु ने खिझते हुए कहा, ‘‘नाश्ता को लेकर क्यों चली आई?’’
मुनिया ने धीरे से कहा, ‘‘बाबा अपने कमरे में नहीं है।’’
‘‘नहीं है, तो कहाँ चले गए? सुबह तो यहीं थे।’’
मुनिया ने कहा, ‘‘आज सुबह से ही बाबा का मन अच्छा नहीं था। वे गुमसुम बैठे थे। मैने पूछा भी था। बाबा कुछ बात है, तो उन्होंने टालते हुए कहा, नहीं तो, पर उनकी आँखें नम थी।’’
‘‘यह तो चिंता की बात है। बड़ी बहु ने कहा।’’
 बिना बताए कोई कहीं चला जाए, तो चिंतित होना स्वाभाविक है। ऐसे भी बुढ़ापा संवेदनशील होता है। बड़ी बहु के मन में कई तरह के विचार आने लगी। विचार क्यों, कुशंका ही कहा जाए। उनके इस तरह बिना बताए कहीं चले जाने से लोग क्या सोचेगें? समाज में बडी फजियत होगी। लोग तो यही कहेंगे कि दो-दो बहुएँ हैं, फिर भी बूढ़े का ध्यान नहीं रख पाए। ‘किंकर्तव्यम् विमुढ’़ की स्थिति में उन्होंने रोशन को जगाया। रोशन उनके पति है। आज रविवार होने के कारण अभी तक सोए हैं। ऐसे किसी भी रविवार को नौ बजे से पहले नहीं उठते। बड़ी बहु या बच्चे जब जाकर झकझोरते हैं, तभी उनकी नींद टूटती है।
बड़ी बहु ने कहा, ‘‘उठो भी, बाबा घर पर नहीं हैं।’’
‘‘नहीं है, मतलब?’’
‘‘मुनिया नाश्ता लेकर उनके कमरे में गई थी, तो वे नहीं मिले।’’
‘‘नहीं थे, तो कहीं आसपास गए होंगे। छोटे बच्चे थोडे ही हैं?’’
‘‘वो बात नहीं है, मुनिया कह रही थी कि सुबह से ही उनका मुड़ ठीक नहीं है। उदास-उदास लग रहे थ,े उनकी आँखें भी नम थी।’’
‘‘चलो ठीक है, मैं देखता हँू।’’
रोशन ने आसपास पता लगाया, किंतु बाबा का कहीं भी पता नहीं चला। बच्चों को परिचितों के घर भेजा गया, आसपास होटलों, मंदिरों और उद्यानों में भी देखा गया, परिचितों से भी पूछा गया। जब कहीं से भी कोई सुराग नहीं मिला, तो चिंता होने लगी। वे जानते थे कि बाबा बिना बताए कहीं भी नहीं जाते है,ं फिर आज अचानक कैसे चले गए? कहाँ गए होंगे? ऐसे अनेक विचार मन में आने लगे। आसपास के लोगों को पता चला, तो जितने मुँह उतनी बातें। ऐसे समय में मुफ्त सलाह देने वालों की संख्या भी कम नहीं होती है। किसी ने कहा कुँओं, तालाबों, नदियों में देख आओ। तो किसी ने कहा रेल्वे स्टेशन, बस अड्डों में देख आओ। कम से कम पुलिस को तो सूचना दे ही दी जाए। घर बैठे आई इस समस्या से पूरा परिवार व्यथित था। इस पर आसपास के लोगों की टिप्पणियाँ मन को अधिक पीडा पहुँचाने वाली थी। रिश्तेदारों को भी फोन लगाया गया, परंतु वहाँ से भी उत्तर न में आया।
यूँ ही दिन बीत गया। शाम होने को है। दिन की बात अलग होती है, पर रात में कहाँ खोजा जाए। इसी उधेड बुन में पूरा परिवार लगा हुआ था। रात को आठ बजने को थे। दूसरे दिन इस समय भोजन की तैयारी होने लगती थी। बाबा जब आठ बजे भोजन करके अपने कमरे में चले जाते हैं, तब पूरा परिवार एक साथ भोजन करते हैं। आज भोजन तो बना रखा है, पर भोजन करने का किसी का मन नहीं है। बड़ी बहु ने अपनी तरफ से भोजन लगाने की बात कही भी, पर किसी ने भोजन करने की इच्छा जाहिर नहीं की। बच्चे भी अपने कमरों में दुबके हुए हैं। उनकी शैतानी न जाने आज कहाँ खो गई है।
मुनिया भले ही छोटी-सी बच्ची है, परंतु बड़ी सयानी है। कभी-कभी ऐसी बातें कह जाती है कि बड़े भी देखते रह जाते हैं। आज भी मुनिया ने सबका धीरज बंधाकर रखा है। जब भी कोई कुछ कहता है, तो वह कहती है कि आप लोग धीरज रखो, बाबा आ जाएँगे। मानो बाबा पर उन्हें विश्वास हो, फिर विश्वास क्यों न हो, बाबा की वह सबसे निकट सहेली है।
सभी के सभी यूँ ही चिंता मग्न बैठे हुए थे, तभी दरवाजे से ‘खट’ की आवाज आई। सबका ध्यान दरवाजे की ओर गई। बाबा दरवाजे को धकेलकर अपने कमरे की ओर बढ़ गए। सभी आवाक देखते रह गए। किसी ने कुछ भी नहीं कहा। मुनिया एक गिलास पानी लेकर बाबा के कमरे में गई।
‘‘बाबा पानी पीएँगे।’’ मुनिया ने कहा।
‘‘हाँ बेटा।’’ कहते हुए उन्होंने गिलास ले लिया।
‘‘बाबा खाना लगा दूँ।’’
‘‘नहीं बेटा, मुझे भूख नहीं है।’’
‘‘पर बाबा आप कहाँ चले गए थे। हम सभी चिंतित थे।’’
‘‘कहीं नहीं बेटा, यूँ ही मन ठीक नहीं था। मेरे कारण तुम सबको परेशानी हुई होगी।’’ यह कहते हुए वे सुबक पड़े। मुनिया समझ गई कि बाबा बहुत आहत है।

मौलिक/अप्रकाशित

(बलदाऊ राम साहू)
सहायक संचालक
आदिम जाति तथा अनुसूचित जाति विकास
रायपुर, छत्तीसगढ़

माँ


माँ स्वयं भूखी है
फिर भी कहती है 
बेटा तुझे भूख लगी होगी
रोटी खा ले
परन्तु बेटा
माँ की बात को
अनसूना कर
निकल जाता है
और माँ बेबस
देखती रहती है उस ओर।