Tuesday, 16 May 2017

निर्लज्ज मानव काट रहे हैं आपस में बतिया रहे हैं महुआ, जामुन, आम पर्वत उजड़े, नदियाँ सूखी चिंतित हैं आवाम. बूढ़ा बरगद सोच रहा दुखड़ा किसे सुनाएँ जिनको हम छाया देते वही हुए पराये चिमनी धुआँ उगल रही दिन बीते कैसे राम. निर्लज्ज मानव काट रहे हैं हरे-भरे सब पेड़ खेतों की गोद सूनी विधवा लगती मेड़ अब इनको समझायें कैसे कैसे दें पैगाम. नेता अफसर लगा रहे फाईलों में बाग इसीलिए सूरज बरसाता आसमान से आग बूँद-बूँद पानी को तरसे जीना हुआ हराम. _बलदाऊ राम साहू 9407650458
न पीपल, न बरगद है न जामुन की छाँव रे, तपते अंगारों से जलते हैं पाँव रे। सूख गई नदियाँ और झरने भी सूख गए, घाट और घरौंदों से, रिश्ते भी टूट गए। अब कहाँ होती है, हँसी और ठिठोली। माथे में बिंदिया, वो पैरों की रोली। ठुमकते हैं अब कहाँ, पनिहारिन के पाँव रे। दूर कहीं जंगल से, गीत नहीं आते हैं। चरवाहे भी अब कहाँ, बाँसुरी बजाते हैं। ० सूनी है गलियाँ और, सूना चौपाल है। अब कौन पूछता, अपनों का,क्या हाल है। पराया-सा लगता है, अपना ही गाँव रे। अब कहाँ सजता है अपना खलिहान रे। सपनों में जीता है अब तो किसान रे। बातों के धनी हैं, और भाषण में महान अंतस को देखो तो खुद से अंजान कहने को गाँव अपना पर नहीं है ठाँव रे। -बलदाऊ राम साहू 9407650458l
माँओं का इतिहास दुनिया में सबसे अच्छा है माँओं का इतिहास। ममता भरा हाथ हमेशा सिर पर वह रखती हैं स्नेह भाव से सराबोर वह कभी नहीं थकती है सबने देखा, समझा किसने माँओं का अनुराग सबसे अनुपम होता हैं उनका हर एक त्याग। कभी नहीं खोती है वह अपने मन का विश्वास। खालीपन भरने में वह तो सक्षम होती है बच्चों के सुख में हँसती है दुख में रोती है प्यार पाने को देव माँओं का शिशु बन जाते हैं उनके आह्वानों पर वे झटपट ही आते हैं। माताओं के नेह पर टिका है धरती और आकाश। छोटों और बड़ों के बीच वह, कड़ियाँ बन जाती हैं बुझती बाती में आशा का भाव जगाती हैं। सबके अंतर-भावों को यूँ ही पढ़ लेती है समभाव से जीने की वह सीख हमें देती है। जीवन के इस छंदशास्त्र में माँ होती है अनुप्रास। बलदाऊ राम साहू मो.न.- 9407650458