Monday, 26 September 2016

विज्ञान लेखन की समस्याएँ और संभावनाएँ
बलदाऊ राम साहू
हिन्दी भारत की राजभाषा है, किंतु यह हमारा दुर्भाग्य है कि आज अधिकतर लेखक अपनी बात हिन्दी भाषा में लिखने में संकोच करते हैं और अंग्रेजी में लिखकर अपने आपको गौरवान्वित महसूस करते हैं। विज्ञान लेखन के क्षेत्र में तो यह प्रवृतियाँ और अधिक देखी जाती है। अधिकतर वैज्ञानिक अपना काम अंग्रेजी में संपादित करते हैं, शोध आलेख अंग्रेजी में लिखते हैं और पढ़ते हैं। शायद उन्हें हिन्दी में सोचने का समय ही ना मिलता होगा! अंग्रेजी उनके दिलोदिमाग में घर कर गया है। वे अंग्रेजी के मोहजाल से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं।  यही कारण है कि हिन्दी में लेखन की संभावनाएँ समाप्त होती जा रही हैं, जो कि हर भारतीय के लिए चिंता का विषय है।
अधिकतर पढ़े लिखे लोग अंग्रेजी में पढ़ने, लिखने व कार्य करने में गर्व महसूस करते हैं और अपने को सम्मानित भी। किंतु यह समझना होगा कि इस हम तरह कहीं हिन्दी भाषा की उपेक्षा तो नहीं कर रहे हैं ? यदि यही चलता रहा तो हिन्दी लेखन की संभावनाएँ समाप्त हो जाएगी और हम हाथ मलते रह जाएँंगे। विज्ञान लेखन तो दूर हम हिन्दी में इतिहास और भूगोल भी नहीं लिख पाएँगे और आने वाले पीढ़ी भाषायी विकलांगता महसूस करेगी।
प्रायः देखा जा रहा है कि आने वाले पीढ़ियों में हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं में विज्ञान पढ़ने वालों की संख्या कम होती जा रही है। इसे हम बदलते वक्त का तकाजा कहें या पश्चिम का अंधानुकरण। दरअसल वह समय आ गया है जब आने वाली पीढ़ी को अपनी मातृभाषा में काम करने की शुरूआत करनी होगी। इससे न केवल भाषा समृद्ध होगी, बल्कि हममें आत्मगौरव का विकास भी होगा।
अक्सर सवाल उठाया जाता है कि यदि हम विज्ञान को अंग्रेजी के अतिरिक्त हिन्दी व अन्य क्षेत्रीय भाषा में पढ़ें व लिखें तो उसकी वैज्ञानिक शब्दावलियाँ नहीं मिल पाती। यह शायद हमारे मन का भ्रम है। जब लेखन ही नहीं होगा तो शब्द आएँगे कहाँ से? शब्दों का आविष्कार आवश्यकता पर निर्भर होता है। जब आवश्यकता महसूस होगी, तब उन तकनीकी शब्दों के लिए नवीन शब्द भी गढ़े जाएँगे। वे शब्द प्रचलन में आएँगे और भाषा को समृद्ध करेंगे। सतत् लेखन से ही भाषा समृद्ध होगी और लेखन की संभावनाएँ विकसित होंगी। कुछ लेखकों का यह भी मानना है कि हिन्दी में तकनीकी शब्दावलियाँ क्लिष्ट होती हैं, यह भी विचारणीय प्रश्न हो सकता है।
हिन्दी में विज्ञान लेखन हेतु वर्तमान में हिन्दी भाषी विज्ञान लेखकों को वैज्ञानिक शब्दावली विकसित करने तथा हिन्दी भाषा के क्लिष्ट वैज्ञानिक शव्दावलियों को रूपांतरित कर सहज बनना होगा। उदाहरण के लिए भौतिकी में अंग्रेजी शब्द तमसनबजंदबम का हिन्दी पर्याय प्रतिष्टम्भ होता है, जो दुरूह कहा जा सकता है। यदि यह सही में दुरूह है, तो इसे सहज करने के लिए विकल्प भी तलाशना होगा और हिन्ही भाषा के वैज्ञानिक शब्दावली से प्रतिस्थापित करना होगा। इस विषय पर यह  भी समझने की आवश्यकता है कि जब तक शब्द प्रचलन में नहीं होगें, तो क्लिष्टता का भान होगा ही, शब्द महज ध्वनियाँ नहीं होती शब्द संस्कृति का हिस्सा होता है। वह मानय पटल पर रचा-बसा होता है। शब्द प्रयोग में आते हैं तबे उनका नवीन संसार बनता है। शब्दों का एक बड़ा संसार होता है। विज्ञान लेखन के संदर्भ में हमें उसकी उत्पत्ति और प्रभुत्व को समझना होगा। हिन्दी भाषा में विज्ञान लेखन की संभावना को तलाशने के लिए भाषायी गौरव को जगाने की भी आवश्यकता है। तभी आगे चलकर हिन्दी भाषा में विज्ञान विषय पर लेखन किया जा सकेगा।
सहायक संचालक
आदिम जाति अनुसूचित जाति विकास विभाग, इंद्रावती भवन, नया रायपुर, छत्तीसगढ़ 

Friday, 23 September 2016

नवगीत

जनता सबो बेहाल

कोन पूछे काकर ले भैया
तिरपट नवा सवाल
जनता सबो बेहाल.

जम्मो डहर लूटपाट हे
मौज करें अपराधी
न्याय तराजू ऊँकरे हाथ मा
जिन्कर तन मा खादी
लोकतंत्र अब हमला लागथे
जीव के रे जंजाल.

चाल-चरित्तर मा कीरा परगे
फोकट गाल बजाये
साधु-संत के बाना धर के
पापी कस चाल चिन्हाये
हाँ मा हाँ मिलइया कतको
हावय इहाँ दलाल.

नवा-नवा इतिहास जम्मो झन
अपन-अपन लिखत हें
जेकर छप्पन के छाती हे
करनी मा दिखत हे
नाक बचा लेवव नकटा मन
पूछे प्रश्न बेताल.

कोख उझर कतको इहाँ
कब तक धीरज धरबो
मुढ़ ले पानी उप्पर होगे
सबर कब तक करबो
गुस्सा आँखी मा तउरत हे
छाती मा बरे  मशाल.

@बलदाऊ राम साहू 

Sunday, 18 September 2016

नवगीत

अगर कोसना है तो कोसो

गाली क्यों देते हो भाई
सत्ता के दलालों को.

किसकी नीयत कैसी है
यह समझ न आए
बैठ मंच पर यहाँ सभी
हरिश्चंद्र बन जाएँ
अगर कोसना है तो कोसो
खुद के ही सवालों को.

भ्रष्ट आचरण करना तो
है इनकी मजबूरी
छल, प्रपंच और धोखा देना
लगता बहुत जरूरी.
थप्पड़ क्यों मारे हम भाई
इनके चिकने गालों को.

दरबारों में बने रहना
होती  टेढ़ी खीर
सभी चाहते सत्ता सुख
पंडित हो या फकीर
झुककर करें सलाम सभी
इन ताकतवर चांडालों को

 - बलदाऊ राम साहू
   मो 9407650458
हिंदी ग़ज़ल



हम जनता हैं, रंगदारों से क्या लेना,
सत्ता के हिस्सेदारों   से  क्या  लेना.

जिनको सागर पार उतरना आता है,
 मल्लाहों को पतवारों से क्या  लेना.

हम तो आते-जाते  हैं, हम  राही हैं,
दुनिया को हम बंजारों से क्या लेना.

पेड़ घना है उस पर नन्हा-सा घर है,
बस दो दाने, बाजारों  से क्या  लेना.

नहीं  खेलना  आता  है  अंगारों  से,
हमें तोप औ’ तलवारों से क्या लेना.

सरकारी है कोष लूट लो जितना चाहो,
तुमको इन मिहनतदारों  से  क्या  लेना.



बलदाऊ राम साहू 
नवगीत

शीला की जवानी

हम सब को बूढ़ी लगती है
घर की राधा रानी
हरदम याद सताती है
शीला की जवानी.

कथा-पुराण सब व्यर्थ हुए
शास्त्र हुए निरर्थक
टी वी के सिरियल लगते
इस भुवन में सार्थक
हमको तो भाती नहीं है
दादी की कहानी.

ग्वाल-बाल  सब सखा रह गए
गोकुल वृंदावन में
रास नहीं होता है अब तो
गोपी संग मधुवन में
राधा के निच्छल प्रेम की
कथा हुई पुरानी.

धर्म, कर्म और नैतिकता
संबंध सभी नि:सार
भोग-बिलास में डूबा हुआ है
पूरा यह संसार
कुरुक्षेत्र में कौन सुनेगा
अब गीता की वाणी.

राग-द्वेष और छल-प्रपंच  से
सब का नाता है
पर निंदा, पर दोष गिनाना
सब को भाता है.
संबंधों की परिभाषा गढ़ना
लगती है बेईमानी.

-बलदाऊ राम साहू
   मो 9407650458

Friday, 16 September 2016

ग़ज़ल
तेरा ही अहसास राम जी

तेरा जब अहसास राम जी
तब कैसा सन्यास राम जी

जागे दया भाव जब मन में
शायद यही सुवास राम जी

राह बने और मंज़िल  पाएँ
वहीं  तुम्हारा  वास राम जी

तेरा हाथ औ’ सर  हो मेरा
मन क्यों रहे उदास राम जी

जब तक तेरी  कृपा  न होए
तब तक मन में प्यास राम जी

'बरस'  कहे व्यर्थ  है  दुनिया
अंतस का  विश्वास  राम  जी.

@बलदाऊ राम साहू
 मो 9407650458
ग़ज़ल

    अपने ही हाथों निखार किस्मत

गजब सयानी है यार किस्मत,
क्यूँ ठगती  हर  बार  किस्मत.

सभी  तरफ  भूख  औ'  बेकारी,
मिले सब को भात-दार किस्मत.

सभी को रोटी-दाल नसीब हो,
चूल्हा उपास धिक्कार किस्मत,

किसी पर बरकत यूँ ही लुटाये,
हमें कर देती  लाचार  किस्मत.

मुबारक  होली- दिवाली  उन्हें
हमें रुलाती सौ - बार किस्मत.

'बरस'अब निराश क्यों हो रहा है,
अपने ही हाथों  निखार  किस्मत.

@बलदाऊ राम साहू 

Friday, 9 September 2016

                          दिया तरी अँधियारी हे


काम    कहो,  सरकारी  हे जी,
संग    अपन    गद्दारी   हे जी.

लुटत  हवय  लुटईया  मन  हर
कहत   हवय   बइपारी   हे जी.

जउन मन ह खँचका ला खानिस,
ऊँकर  ले   अब   यारी   हे  जी.

जेकर  जस  मनखे   मन   गाथे,
वोकर      भारी  छाती   हे   जी,

जउन  ह  सिधवा  मनखे  हावय
उन्कर   खातिर    चारी   हे  जी.

देस  ल फोकला जउन करत हें,
उन्कर    घर    देवारी    हे  जी.

परगट    मरजाद   बेंचावत  हे,
काल  अपन  के   बारी   हे जी
 
'बरस' कहत  हे  जबर  इहाँ  रे,
दिया  तरी   अँधियारी   हे  जी,

-बलदाऊ राम साहू
 मो 9407650458

Monday, 5 September 2016

सामाजिक विसंगतियों पर कविता

हम सब को बूढ़ी लगती है
घर की राधा रानी
हरदम याद सताती है
शीला की जवानी.

कथा-पुराण सब व्यर्थ हुए
शास्त्र हुए निरर्थक
टी वी के सिरियल लगते
इस भुवन में सार्थक
हमको तो भाती नहीं है
दादी की कहानी.

ग्वाल-बाल  सब सखा रह गए
गोकुल वृंदावन में
रास नहीं होता है अब तो
गोपी संग मधुवन में
राधा के निच्छल प्रेम की
कथा हुई पुरानी.

धर्म, कर्म और नैतिकता
संबंध सभी नि:सार
भोग-बिलास में डूबा हुआ है
पूरा यह संसार
कुरुक्षेत्र में कौन सुनेगा
अब गीता की वाणी.

राग-द्वेष और छल-प्रपंच  से
सब का नाता है
पर निंदा, पर दोष गिनाना
सब को भाता है.
संबंधों की परिभाषा गढ़ना
लगती है बेईमानी.

-बलदाऊ राम साहू
   मो 9407650458
छत्तीसगढ़ के पर्व 'तीजा परब'  की शुभकामनाएँ

दू दिन पहिली तीजा गे हे,
नोनी के महतारी ह,
हमला गजब बिजरावत हावय,
सबले छोटे सारी ह.

मन ह तन ह सुन्ना लागथे,
जिनगी सुन्ना भइगे.
चाबे ला दऊड़त हावय,
अपने घर के दुवारी ह.

दार-भात चिबराहा हो गे,
नूनछुर हो गे साग,
बिल्कुल नइ सुहावय संगी
संझा  के बियारी  ह.

संग राहय तब चिकचिक लागे,
वोकर गोठ-बात
अाज गजब गुदगुदावत हावय,
वोकर  देय  गारी.

बचपन मा जेकर संग खेलेन
उही टूरी मन आये हे
जहर बरोबर लागथे संगी,
उन्कर खीर-सोंहारी ह.

कतको कहि ले समरथ हन
मन के ये भरम ये,
चारे दिन मा पता चलगे
मनखे के हुसियारी ह.

@बलदाऊ राम साहू
शिक्षक दिवस के अवसर पर सभी शिक्षक भाई-बहनों को हार्दिक शुभकामनाएं.

शिक्षक कहने से मन में एक अलग सी छवि उभर कर आती है.  वह है एक आदर्श मानव की. जो उच्च चारित्रिक मूल्य धारण करता हो, मेहनती, ईमानदार और बच्चों के लिए समर्पित हों, उनमें सांस्कृतिक चेतना का विकास करें,  ऐसे शिक्षक होते थे,  किंतु आज शायद  नहीं.
    सामाजिक परिवर्तन के साथ-साथ शिक्षकों के दृष्टिकोण में बड़ा परिवर्तन आया है. परिणाम स्वरूप शिक्षा में गिरावट आई है. समाज और बच्चों के मन में भी शिक्षकों के प्रति सम्मान के वे भाव नहीं दिखते,  जिनकी अपेक्षा की जाती रही है. शिक्षकों के मन में आई उदासीनता के प्रति सरकारी नीतियाँ काफी भी हद तक जिम्मेदार है. सरकार में बैठे लोग ढोल पिटते हैं कोई कारगर उपाय नहीं करते.  इन सब का खामियाजा बच्चे भुगत रहे हैं. आगे सब को सोचना होगा. क्या करें कि एक सभ्य, शालीन कर्तव्यनिष्ठ और उदार समाज का निर्माण हो सके.

जीवन की इस कठिन राह में
चलना हमें सिखाया.
नन्हे बीज सरीखे थे हम
वट-सा वृक्ष बनाया।

धोती - कुरता, और हाथ में
छाता लेकर चलते थे
बरसा जाड़ा या हो गरमी
देर कभी न करते थे
सूरज ने भी शायद उनसे
ग्यान यही पाया होगा
सारा काम समय पर करना
अपनों को समझाया होगा.
हम तो माटी के लौंदे थे
उसने कुंभ बनाया.

सत्यनिष्ठा, सहानुभूति की
मूर्ति वे लगते थे
काम निरंतर करते थे पर
कभी नहीं थकते थे.
परोपकार भाईचारे का
पाठ हमें पढ़ाया
हम सब के भीतर से उसने
अंधकार को दूर भगाया.
ग्यान जोत जलाकर हमको
मंज़िल तक पहुँचाया.

अपने  आदर्शों के चलते
लोक में पूजे जाते थे
कथा-पुराण और वेदों का
सार हमें समझाते थे
उनके भीतर माँ की ममता
पिता-सा था प्यार
सूरज, चाँद, समुंदर जैसा
था पूरा संसार ।
अभावों में रहकर उसने
गुरु का धर्म निभाया

-बलदाऊ राम साहू
आलेप्रे


आदिवासी संस्कृति में निहित टोटमवाद और पर्यावरण संरक्षण

 भारतीय संस्कृति में वृक्षों की बड़ी महत्ता है। वृक्षों को‘देव’माना गया है। हमारी संस्कृति में पीपल, नीम, आम इत्यादि वृक्ष पूजनीय है। इसी कारण वृक्षों को न ही काटने की परंपरा है न ही  जलाने की। आज भी गाँव में इन वृक्षों के लकड़ी को जलाऊ के रूप में उपयोग नहीं किया जाता। यह आदिवासी संस्कृति की देन है। स्नानादि करने के बाद वृक्षों को जल देने की परंपरा में वृक्षों के संरक्षण का ही भाव छिपा हुआ है । इन वृक्षों को‘देव’रूप में मानने का वैज्ञानिक आधार भी है। यदि हम अपनी परंपराओं का विश्लेषण करें, तो यह स्पष्ट होता है कि परंपरा का उद्भव मानव जीवन के विकास के लिए हुआ है। यदि हम तुलसी के पौधे पर ही बातें करें तो स्पष्ट है, तुलसी चौबीसों घंटे आॅक्सीजन प्रदान करती है, पर्यावरण को शुद्ध रखती है, यही नहीं तुलसी के पौधे कितने ही सारे औषधि गुणों से युक्त हैं। यदि इन परंपराओं का सम्यक उद्भव नहीं हुआ होता, तो पर्यावरण आज से कई सौ साल पहले नष्ट हो गया होता और मानव जाति खतरे में होता।
         आदिवासी संस्कृति की अपनी एक विशेषता है। बारीकी से हम आदिवासी संस्कृति, परंपरा, लोक जीवन और पर्वों का अध्ययन करें, तो अनके विकासात्मक तत्व दृष्टिगोचर होते हैं । हम सदियों से आदिवासियों को पिछड़ा मानते रहे हैं, उन्हें गँवार की संज्ञा देते रहे हैं, पर वास्तव में ऐसा नहीं है. आदिवासी संस्कृति में जो परंपराएँ हैं, उन सबका वैज्ञानिक दृष्टिकोण और संवेदना से युक्त मानवीय आधार है। हाँ, हम यह कह सकते हैं कि आदिवासी समाज तक शिक्षा का प्रकाश बहुत विलंब से पहुंचा है। वे औपचारिक शिक्षा इसलिए ग्रहण नहीं कर पाये, क्योंकि वे बीहड़ जंगलों में निवास करते थे। उनके पास आवागमन के पर्याप्त साधन नहीं थे। तथाकथित विकसित समाज ने अपनी साम्राज्यवादी/सामंतवादी सोच के कारण इन्हें शिक्षा से दूर रखा, किन्तु वे अपने अनौपचारिक स्रोतों से भलीभांति शिक्षित होते रहे हैं। सामाजिकता में शाँति, समरसता, भाईचारे का भाव उनके अंदर सदैव से रहा है । वे अपनी न्यून आवश्यकता के कारण सदैव संतुष्ट रहे और अपने बुजुर्गों से प्राप्त परंपरागत शिक्षा का उपयोग जीवन को सार्थक बनाने के लिए करते रहे।
          आदिवासियों की अपनी भाषा, संस्कृति एवं परंपराएँ हैं। इन परंपराओं में सामूहिक जीवन, सामूहिक उत्तरदायित्व और भावनात्मक संबंध कूट-कूटकर भरे हुए हैं। यही कारण है कि इनमें परस्पर विश्वास एवं स्वाभाविक संबंध कायम रहता है। ये केवल सहज, सरल, प्राकृतिक जीवन जीते हैं और यही प्राकृतिक जीवन पर्यावरण संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण कारक है।
   छत्तीसगढ़ के आदिम समाज में मानव समुदाय के बीच संबंध के अनेक रूप मिलते हैं जिसमें एक टोटम है। यह ऐसा ही संबंध है जैसे एक माँ से जन्मे भाई-बहन के बीच का होता है। यह संबंध प्राणी जगत के साथ अनेक रूपों में दिखाई पड़ता है। इन संबंधों को टोटमवाद कहा जाता है। आदिवासी अपने को किसी प्रकार के टोटम से संबद्ध मानता है, उनसे अपना अनुवांशिक रिश्ता जोड़ता है। यह टोटम किसी पशु, पक्षी या वृक्ष से होता है। इन्हीं संबंधों के आधार पर वे इनके प्रति विश्वास, श्रद्धा, भक्ति और आदरभाव रखते हैं और उनकी आराधना करते हैं। टोटम पर यदि कोई विपत्ति आती है, तो संबंधित जनजाति पर यह विपत्ति संभावित मानी जाती है। वे टोटम से संबंधित जीव को छूना, मारना, मारकर खाना पसंद नहीं करते। टोटम एक तरह से गणचिह्न हैं , जो किसी समाज के उस विश्वास को प्रकट करते हैं जिसका उनके जीवन से व्यापक सरोकार है। यदि हम टोटम का विश्लेषण करें, तो यह विशुद्ध रूप से मानववाद और प्रकृतिवाद का अतुलनीय उदाहरण है । एक-दूसरे से अन्योयाश्रित संबंध। टोटम का संबंध शायद जीव-जगत से लगाव व प्रकृति से प्रेम हो सकता है, जो कि प्रकृति संरक्षण का आदिम नियम है । यह स्वाभाविक है कि हम जिस पशु को पालते हैं उससे हमारा लगाव हो जाता है, ठीक उसी प्रकार हम अपने द्वारा रोपे गए पौधों को नहीं काटते। इसी भाव ने धीरे-धीरे परंपरा का रूप ले लिया। जो आज जैविक संतुलन व पर्यावरण को संरक्षित करने में अपनी अहम भूमिका रखता है। टोटम में निर्धारित जीव व वृक्ष का किसी न किसी तरह मानव जीवन से निकटम संबंध रहा है। यह पर्यावरण को सुरक्षित रखने में सहायक है। हम यह भी कह सकते हैं कि इस परंपरा के माध्यम से प्रत्येक व्यक्ति द्वारा किसी न किसी जीव को बचाने के लिए संकल्प लिया जाता है। इस तरह के संकल्प से न केवल जीव जगत और जंगल का संरक्षण होता है, बल्कि मानव जीवन के विकासात्मक दृष्टिकोण का प्रतिपादन भी होता है।
       टोटम पर चर्चा करते हुए गोंड आदिवासी समाज के प्रमुख श्री भरतलाल कोर्राम ने बताया कि आदिवासी गोंड समाज में 750 गोत्र हैं, जो कि 100-100 के समूह में 07 उपभागों में विभाजित हैं। 50 गोत्र गुरु गोत्र हैं । प्रत्येक गोत्र के तीन-तीन टोटम है। एक पशु, एक पक्षी और वृक्ष। इस टोटम परंपरा के माध्यम से हम आदिवासी 2250 जीवों का संरक्षण करते हैं।   यह परम्परा मूलतः पारिस्थितिक तंत्र पर आधारित है । यह रक्षण और भक्षण के सिद्धांत पर आधारित है। टोटम एक तरह से रक्ष् संस्कृति है। ‘रक्ष्’ अर्थात् रक्षा करना। इस तरह पर्यावरण का संरक्षण हमारी परंपरा का हिस्सा है।
     हम यह कह सकते हैं कि आदिवासी मन और आत्मा से पर्यावरण से जुड़ा हुआ है। यही जुड़ाव उनकी सामाजिक परंपराओं को परिलक्षित होता है। पर्यावरण से संबंधित आदिवासी समाज का ज्ञान, समझ और अनुभव व्यापक है। यही समझ उसकी सांस्कृतिक धरोहर का आधार है, किन्तु यह भी चिंता का विषय है कि तथाकथित शिक्षित आदिवासी समाज व युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति व धरोहरों से दूर होती जा रही है। इस पर केवल आदिवासी समाज को ही नहीं  बल्कि पूरे मानव समाज को विचार करना होगा और इन आदिम परंपराओं को अपने जीवन के साथ जोड़कर पर्यावरण संतुलन को बनाएँ रखने में अपना योगदान देना होगा ।

मौलिक एवं अप्रकाशित   बलदाऊ राम साहू
                                    सहायक संचालक
                         आदिमजाति विकास विभाग इंद्रावती भवन, डी. ब्लाक, नया रायपुर



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