शिक्षक दिवस के अवसर पर सभी शिक्षक भाई-बहनों को हार्दिक शुभकामनाएं.
शिक्षक कहने से मन में एक अलग सी छवि उभर कर आती है. वह है एक आदर्श मानव की. जो उच्च चारित्रिक मूल्य धारण करता हो, मेहनती, ईमानदार और बच्चों के लिए समर्पित हों, उनमें सांस्कृतिक चेतना का विकास करें, ऐसे शिक्षक होते थे, किंतु आज शायद नहीं.
सामाजिक परिवर्तन के साथ-साथ शिक्षकों के दृष्टिकोण में बड़ा परिवर्तन आया है. परिणाम स्वरूप शिक्षा में गिरावट आई है. समाज और बच्चों के मन में भी शिक्षकों के प्रति सम्मान के वे भाव नहीं दिखते, जिनकी अपेक्षा की जाती रही है. शिक्षकों के मन में आई उदासीनता के प्रति सरकारी नीतियाँ काफी भी हद तक जिम्मेदार है. सरकार में बैठे लोग ढोल पिटते हैं कोई कारगर उपाय नहीं करते. इन सब का खामियाजा बच्चे भुगत रहे हैं. आगे सब को सोचना होगा. क्या करें कि एक सभ्य, शालीन कर्तव्यनिष्ठ और उदार समाज का निर्माण हो सके.
जीवन की इस कठिन राह में
चलना हमें सिखाया.
नन्हे बीज सरीखे थे हम
वट-सा वृक्ष बनाया।
धोती - कुरता, और हाथ में
छाता लेकर चलते थे
बरसा जाड़ा या हो गरमी
देर कभी न करते थे
सूरज ने भी शायद उनसे
ग्यान यही पाया होगा
सारा काम समय पर करना
अपनों को समझाया होगा.
हम तो माटी के लौंदे थे
उसने कुंभ बनाया.
सत्यनिष्ठा, सहानुभूति की
मूर्ति वे लगते थे
काम निरंतर करते थे पर
कभी नहीं थकते थे.
परोपकार भाईचारे का
पाठ हमें पढ़ाया
हम सब के भीतर से उसने
अंधकार को दूर भगाया.
ग्यान जोत जलाकर हमको
मंज़िल तक पहुँचाया.
अपने आदर्शों के चलते
लोक में पूजे जाते थे
कथा-पुराण और वेदों का
सार हमें समझाते थे
उनके भीतर माँ की ममता
पिता-सा था प्यार
सूरज, चाँद, समुंदर जैसा
था पूरा संसार ।
अभावों में रहकर उसने
गुरु का धर्म निभाया
-बलदाऊ राम साहू
शिक्षक कहने से मन में एक अलग सी छवि उभर कर आती है. वह है एक आदर्श मानव की. जो उच्च चारित्रिक मूल्य धारण करता हो, मेहनती, ईमानदार और बच्चों के लिए समर्पित हों, उनमें सांस्कृतिक चेतना का विकास करें, ऐसे शिक्षक होते थे, किंतु आज शायद नहीं.
सामाजिक परिवर्तन के साथ-साथ शिक्षकों के दृष्टिकोण में बड़ा परिवर्तन आया है. परिणाम स्वरूप शिक्षा में गिरावट आई है. समाज और बच्चों के मन में भी शिक्षकों के प्रति सम्मान के वे भाव नहीं दिखते, जिनकी अपेक्षा की जाती रही है. शिक्षकों के मन में आई उदासीनता के प्रति सरकारी नीतियाँ काफी भी हद तक जिम्मेदार है. सरकार में बैठे लोग ढोल पिटते हैं कोई कारगर उपाय नहीं करते. इन सब का खामियाजा बच्चे भुगत रहे हैं. आगे सब को सोचना होगा. क्या करें कि एक सभ्य, शालीन कर्तव्यनिष्ठ और उदार समाज का निर्माण हो सके.
जीवन की इस कठिन राह में
चलना हमें सिखाया.
नन्हे बीज सरीखे थे हम
वट-सा वृक्ष बनाया।
धोती - कुरता, और हाथ में
छाता लेकर चलते थे
बरसा जाड़ा या हो गरमी
देर कभी न करते थे
सूरज ने भी शायद उनसे
ग्यान यही पाया होगा
सारा काम समय पर करना
अपनों को समझाया होगा.
हम तो माटी के लौंदे थे
उसने कुंभ बनाया.
सत्यनिष्ठा, सहानुभूति की
मूर्ति वे लगते थे
काम निरंतर करते थे पर
कभी नहीं थकते थे.
परोपकार भाईचारे का
पाठ हमें पढ़ाया
हम सब के भीतर से उसने
अंधकार को दूर भगाया.
ग्यान जोत जलाकर हमको
मंज़िल तक पहुँचाया.
अपने आदर्शों के चलते
लोक में पूजे जाते थे
कथा-पुराण और वेदों का
सार हमें समझाते थे
उनके भीतर माँ की ममता
पिता-सा था प्यार
सूरज, चाँद, समुंदर जैसा
था पूरा संसार ।
अभावों में रहकर उसने
गुरु का धर्म निभाया
-बलदाऊ राम साहू
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