Thursday, 3 September 2020

ग़ज़ल छाती अड़ाना आ गया है

 छाती अड़ाना आ गया है 


पतझरों का अब ज़माना आ गया है।

रूप हमको  नव  बनाना आ गया है।


कब तलक  हम  मौन  हो  बैठे रहते 

अब हमें भी  मुस्कुराना  आ गया है।


डर रही  हैं  अब  स्वयं  रातें  अँधेरी 

देख लो, सूरज उगाना  आ  गया है।


व्यर्थ हमको जो  चिढ़ाते  में  लगे थे 

आईना उनको  दिखाना आ गया है।


वो कबूतर लौट आया है 'बरस' फिर,

जानकर छाती अड़ाना  आ  गया  है।


-बलदाऊ राम साहू 

दुर्ग, छत्तीसगढ़

मोबाईल-9407650458

चलो बंदर को भगाएँ

 कथा-कहानी 


हमें   सुनाओ  कथा - कहानी

जिसमें   आए,   राजा - रानी।


वही   कहानी   परियों  वाली

जिसको कहती, अपनी नानी।


उसमें   दादा  -  दादी    आएं

हो  भले  ही   बहोत   पुरानी।


भालू  -  बंदर   आए    उसमें 

हिरन  आए निरा  अभिमानी।


नन्ही- नन्ही   चिड़िया   आएं

कोयल   आए  बड़ी   सयानी।


-बलदाऊ राम साहू

Friday, 28 August 2020

महापुरुष बन जाओ

 महापुरुष बन जाओ


मिहनत कर जो आगे बढ़ते 

सफल वही कहलाते हैं 

संघर्षों को गले लगाते 

इतिहास वही बनाते हैं 


मिहनत करता, पानी देता 

नन्हीे पौध उगाता है

हरदम जिसका बहा पसीना 

धरा पूत कहलाता है ।


महापुरुष तो बचपन से ही

लक्ष्य बड़ा बनाते हैं

एक न एक दिन उनको पूरा 

करके वे दिखलाते हैं।


तुम भी बच्चों मिहनत करके

कुछ नव करके दिखलाओ

कठिन पंथ अपनाओ औ' फिर

महापुरुष तुम बन जाओ।


-बलदाऊ राम साहू

Tuesday, 18 August 2020

पोला पर्व का अंतर्भाव

 पोला पर्व का मानवीय पक्ष और अंतर्भाव 


प्रत्येक प्रांत के अपने विशिष्ट पर्व होते हैं। जिनसे उसका सांस्कृतिक संबंध होता है । खान- पान, रीति-रिवाज, आचार-व्यवहार का संबंध मानवीय भाव भूमि से होता है। जिसे वह किसी न किसी रूप में व्यक्त करता है। यह व्यक्त करने का संबंध मनुुष्य के चेतन प्राणी होने से है। चेतन प्राणी होने के नाते उसमें संवेदनाएं होती हैं जिन्हें वह अपने पर्व और  परंपराओं के माध्यम से अभिव्यक्ति देता है। सुख-दुख को मनुष्य अपने भीतर कभी सम्भाल कर नहीं रख सकता क्योंकि वह अपनी भावनाओं का प्रकटीकरण करना चाहता है। चाहे वह हँसे, गाए या रोए। जिस रूप में भी हो उसे वह एक दूसरे से बाँटता है। जिसे हम त्यौहार,  पर्व और परंपरा का नाम दे देते हैं । पर्वों  एवं परंपराओं का अपना महत्व होता है। इन पर्वों में निहित उद्देश्यों का जब हम विश्लेषण करते हैं, तब एक नया भाव उभरकर आता है और यह हमें अहल्लादित ही नहीं करता बल्कि हमें एक नवीन दृष्टि देता है।

छत्तीसगढ़ कृषि प्रधान राज्य है, यहाँ प्रमुखतः धान की खेती होती है।  यहाँ के पर्व और परंपराओं का आधार कृषि ही है। कृषि संस्कृति में अनेक भाव निहित हैं, उन्हीं भावों की अभिव्यक्ति ही पर्व हैं। जिन्हें हम छत्तीसगढ़ में तिहार कहते हैं। छत्तीसगढ़ में मनाए जाने वाले पर्वों में हरेली, पोला, दिवाली, देवउठावनी, अक्ति (अक्षय तृतीया) आदि सभी पर्वों का संबंध किसी न किसी रूप में कृषि परंपरा से जुड़ा हुआ है। इसे जानने और समझने की आवश्यकता है कि इन पर्वों को मनाने की परंपरा कब और कैसे बनी होगी?

    पोला पर्व भादों मास के अमवस्या के दिन मनाया जाता है। इस दिन को अलग-अलग प्रांतों में अलग-अलग तरह से मनाया जाता है। इस पर्व की शहर से लेकर गांव तक धूम रहती है। जगह-जगह बैलों की पूजा-अर्चना होती है। गांव के किसान भाई सुबह से ही बैलों को नहला-धुलाकर सजाते हैं, फिर हर घर में उनकी विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद घरों में बने पकवान भी बैलों को खिलाए जाते हैं।

बैल किसानों के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। किसान बैलों को देवतुल्य मानकर उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। पहले कई गांवों में इस अवसर पर बैल दौड़ का भी आयोजन किया जाता था, लेकिन समय के साथ यह परपंरा समाप्त होने लगी है। जैसे कि मैंने कहा बैल कृषि कार्य में कितना महत्व रखते हैं, उसे कृषक ही जानता है। आज के वैज्ञानिक (मशीन) युग में भले ही बैल का महत्व खत्म हो गया, किन्तु कालांतर में कृषि कार्य के लिए यह महत्वपूर्ण साधन रहे हैं। बैलों की पूजा करना अर्थात उनकी सुरक्षा के प्रति जागरूक होना और उनके प्रति आभार का भाव रखना है। क्योंकि बैलों के अभाव या न होने से कृषक एक पग भी आगे नहीं बढ़ सकता था। यह त्यौहार हमें कृतज्ञता का भाव सिखाता है। कि अपने सहयोगी या साथी के प्रति कैसे भाव प्रकट करें।

    इस पर्व दूसरा पक्ष है गर्भाही। पोला को आज भी ग्रामीण इलाकों में गर्भाही तिहार (त्यौहार) के रूप में जाना जाता है या मनाया जाता है। गर्भाही अर्थात् गर्भधारण करना। भादो अमावस्या के आते-आते ऐसी मान्यता है कि धान के पौधों में पोटरी आ जाता है, दूध भर आता है। पोटरी अर्थात् पुष्ट होना। पुष्ट होने का अर्थ केवल सबल होना नहीं है, बल्कि धान के पौधों का गर्भधारण करना है। अर्थात् धान के पौधों के भीतर बालियों का अपरिपक्व रूप में आना है। इसे ही पोटरी आना कहते हैं । इसीलिए इस त्यौहार को गर्भाही तिहार कहते हैं। गर्भाही तिहार का छत्तीसगढ़ में बड़ा महत्व है। बल्कि इसका सुन्दर मानवीयकरण का पक्ष है। पोला के दिन कृषक अपने खेतों में चीला चढ़ाता है। चीला चढ़ाने का भी एक विधान है। इसे हम लोक रूप में पूजा विधान की तरह देख सकते हैं। कृषक घर पर गेंहूँ का मीठा चीला बनवाता है और एक थाली में रोली, चंदन, दीप, नारियल, अगरबत्ती आदि पूजा का समान रखकर खेत में जाता है और खेत के भीतर एक किनारे में पूजा विधान कर घर से लाये हुए चीला को वहीं आदर पूर्वक मिट्टी में दबा देता है। और अभ्यर्थना करता है कि उसकी फसल अच्छी हो ।किसी तरह रोग-दोष ना आये। इसका अंतर्भाव यह भी हो सकता है। पुष्ट देह होगी तभी तो फसल भी पुष्ट होगी। 

गर्भाही तिहार का भाव और प्रक्रिया ठीक उसी तरह की है, जब बेटियाँ  गर्भधारण करतीं हैं , तब मायके से ‘सधौरी’ ले जाने की परंपरा है। सधौरी माने विविध प्रकार के पकवान। कहने का अभिप्राय यह है कि गर्भावस्था में कुछ खाने की अधिक इच्छा होती है, उसी साध को पूरा करने के लिए मातृ पक्ष से यह आयोजन किया जाता है। ठीक उसी प्रकार कृषकों के खेतों में धान के पौधे में पोटरी आने लगता है, तब उसे बेटी सदृश्य मानकर चीला चढ़ाते हैं, यह कृषि परंपरा का एक मानवीय स्वरूप और उदार भाव है।

इस परंपरा का विकास कब और कैसे हुआ होगा, यह कहना संभव नहीं है। लेकिन यह सत्य है कि इसके प्रति एक व्यापक और उदार सोच रही होगी। मानव मन हमेशा चिंतनशील रहा है साथ वह उत्सव धर्मी भी है। इसी उत्सव धर्मी सोच से ही विविध पर्वों का विकास हुआ होगा । यह जीवन में आई एक रसता को समाप्त करने की पहल भी है।

यह त्यौहार बच्चों के लिए भी बहुत महत्व रखता है। इस दिन को हम कृषि पर्व के रूप में तो मनाते ही हैं। पर  मुझे इसमें शैव परंपरा का भी भाव दिखता है। इस दिन बैलों की पूजा के साथ-साथ मिट्टी के बैलों की पूजा और पोरा-जांता की भी पूजा की जाती है। पूजा के पश्चात मिट्टी के बैलों को लड़के और पोरा-जांता लड़कियाँ खेलती हैं। इस मिट्टी के बैल को भगवान शिव के सवारी नंदी मान कर पूजा किया जाता है। वहीं पोरा-जांता को शिव का स्वरूप मानकर पूजा जाता है। बच्चे इस दिन गेंड़ी जुलुस भी निकालते हैं। यह गेंड़ी चढ़ने का अंतिम दिन होता है। पोला के दूसरे दिन गेंड़ी को विसर्जित कर देते हैं। इस तरह हम इस पर्व में अनेक तत्वों का समावेश पाते हैं। 

इस पर्व के संबंध में एक किंवदंती है। मुगल शासन काल में बल पूर्वक धर्म परिवर्तन कराया जा रहा था। तथा हिंदू धर्म की पूजा पद्धति में रोक लगाई जा रही थी। हिंदू छुप-छुपकर अपने देवी देवताओं की पूजा अर्चना करते थे। अपने पूजा के प्रतीकों का उपयोग करते थे ताकि मुगल हस्तक्षेप न कर सके। हिंदू भक्तों ने शिव पूजा को  इस प्रतीक के रूप मे लिया। इस दिन पकवान के रूप में ठेठरी और खुरमी आवश्यक रूप से बनाया जाता है। यदि हम ठेठरी और खुरमी के मूल स्वरूप को देखें तो खुमरी शिव और ठेठरी जलहरी के प्रारूप है। 

   पोला के  इस बहुआयामी पर्व को देखें और समझें तो हम जान सकेंगे कि लोक में पर्वों का क्या महत्व है और हमारे बुजुर्गों ने कितने उदार भाव से इनकी परिकल्पना की होगी। यदि इन पर्वों का आयोजन नहीं होता तो न ही मानवीय चेतना का विकास होता और न ही समाज में  समरसता का भाव पैदा होता।


बलदाऊ राम साहू 

गोविंदाशीष 

न्यू आदर्श नगर, होटल सांई राम के पास (पोटिया चौक) दुर्ग, छत्तीसगढ़ 

मोबाइल- 9407650458

Sunday, 9 August 2020

बाल गीत नव संचार करें

 नव संचार करें 


जिस देश  में  जन्म लिए है

 *उस पर* हम  अभिमान  करें 

अपना जीवन करें समर्पित 

भारत   का   निर्माण   करें।


पूरब   से    रवि  निकलेगा

नई   किरण   *तब*  आएगी 

चूँ-चूँ,   चूँ   करती  चिड़िया 

मंगल      गीत     सुनाएगी।


नए  युग  में नव जीवन का 

आओ   नव    संचार   करें 

बढ़े  प्रगति   के   पथ   पर 

भारती  का   जयकार  करें।


-बलदाऊ राम साहू

Saturday, 8 August 2020

लबरा होगे बदर



बादर लबरा होगे...*

अब असाढ़ ले सावन आगे
तरिया नदिया सबो सुखागे।

तोर अगोरा म  बइठे-बइठे 
बिन पानी  के  बुध सिरागे

जीव-जन्तु सब तड़पत हावै 
लागत हवे  कलजुग  हमागे।

तीपत  भोंभरा  फोरा  परगे
बादर  लबरा   कहाँ   परागे।

द्रोण साहू 
मोका, गुंडरदेही 

Thursday, 23 July 2020

पेड़ लगाओ

: शिशु-गीत
       पेड़ लगाओ

आओ-आओ, बच्चो आओ
एक-एक तुम पेड़  लगाओ।

ठंडी     हवा    बहाएँगे   ये
बरखा के बादल  लाएँगे ये।

इसमें   मीठे   फल   आएँगे
बच्चों  को  सभी  लुभाएँगे।

पेड़ों    पर   पंछी    गाएँगे
कलरव  से  तुम्हें  जगाएँगे।

-बलदाऊ राम साहू

: शिशु-गीत

            छाता

रंग - बिरंगे     प्यारे - प्यारे
देखो    छाते   न्यारे - न्यारे।

बारिश के दिन आते  हैं  ये
हम सब को ललचाते हैं ये।

चटक  रंग   है  देखो  नीला
लाल, गुलाबी औ'  है  पीला।

चलो   चलें  छाते ले आएँ
बारिश में इन्हें मित्र  बनाएँ।

-बलदाऊ राम साहू

आज के बच्चे और बाल साहित्य


आज के बच्चे और बाल-साहित्य


आज का समाज बहुत बदला हुआ है। समाज बदला है, समाज की सोच बदली है। इस बदले हुए समाज में बच्चे और बच्चों की आकांक्षाएं बदलीं हैं, सुविधाएं बढ़ी हैं, संसाधन बदले हैं। इस बदलाव के युग में साहित्य और साहित्यिक दृष्टिकोण में भी बदलाव आया है, तो निश्चय ही बाल साहित्य में भी बदलाव आना स्वाभाविक है।
बाल-साहित्य कहने से मस्तिष्क में जो दृश्य उभरते हैं उनमें शामिल है -बच्चों की जिज्ञासा, चंचलता, कल्पना और उनका नटखटपन। बच्चे स्वभाव से सहज, सरल, निश्छल होते हैं और यही गुण बाल-साहित्य में समाहित होते हैं। बाल-साहित्य  भाषायी संस्कार को विकसित करने का एक माध्यम भी है। बाल-साहित्य को अलग करके हम बच्चों की शिक्षा की परिकल्पना भी नहीं कर सकते । प्राथमिक से माध्यमिक शाला तक की पाठ्यवस्तु को बाल साहित्य से पृथक करके नहीं देख सकते । भाषा और साहित्य का सम्बन्ध अन्योन्याश्रित है। साहित्य के माध्यम से भाषायी विकास और भाषा के माध्यम से साहित्य की समझ, ये दो पहलू हमारे समक्ष होते हैं। बाल-साहित्य को भाषायी चेतना के रूप में भी देखा जाना चाहिए। बच्चे, बाल-साहित्य के माध्यम से भाषायी संरचना को क्रमशः समझते चलते हैं, यह ही नहीं, नई भाषा भी गढ़ते हैं। बच्चे सहज रूप में अपेक्षित ज्ञान प्राप्त करने के लिए उन्मुख होते हैं। बच्चों में भाषायी विकास के साथ चिंतन, परिकल्पना, जिज्ञासा को प्रबल करने में बाल-साहित्य मददगार भी होता है। यह केवल परिकल्पना और जिज्ञासा पैदा नहीं करता बल्कि समाधान भी देता है।

बच्चों के लिए लिखना आमतौर परकाया प्रवेश करना जैसा ही है। यह कहें कि बच्चा बनना है । बच्चा बनकर ही बाल साहित्य लिखा जा सकता है। और यह चुनौतीपूर्ण कार्य होता है। उसमें न केवल बालमनोविज्ञान को समझने जैसी चुनौती होती है बल्कि अपने से अधिक जिज्ञासु और ऊर्जावान मस्तिष्क की अपेक्षाओं पर खरा उतरना होता है। ऐसा वही साहित्यकार कर पाते हैं जिनमें नया सोचने और उसको रोचक ढंग से प्रस्तुत करने की क्षमता होती है। जो अपने पूर्वाग्रहों को पीछे छोड़कर सृजनात्मकता बनाए रखते हैं वे ही आज की आवश्यकता के अनुरूप मौलिक साहित्य रच पाते हैं। आधुनिक संदर्भों को जोड़कर रखना सृजनात्मक मेधा से संभव है। विज्ञान या समाज विज्ञान को समझ कर मौलिक अभिव्यक्ति वही दे सकता है जिन्होंने बालसाहित्य को जड़ता से मुक्त करने के लिए अपनी कलम चलाई है।

बच्चे समर्थ समाज का एक महत्वपूर्ण अंग हैं। हम बच्चों को अलग करके किसी भी समाज की परिकल्पना नहीं कर सकते। बच्चों में ही एक स्वस्थ और चेतना युक्त समाज प्रतिबिंबित होता है, इसलिए हम समाज में बच्चों की उपस्थिति को अस्वीकार भी नहीं कर सकते। इस दृष्टि से बच्चों के विकास के लिए मनोवैज्ञानिक और मनोरंजनात्मक बाल-साहित्य का होना आवश्यक है। बाल-साहित्य बच्चों का मित्र भी है और मार्गदर्शक भी, साथ ही जीवन मूल्यों को जानने और समझने का माध्यम  भी।बच्चा बाल-साहित्य की कविता, कहानी, एकांकी, जीवनी या अन्य विधाओं के माध्यम से आए विचारों को अपने से जोड़कर देखता है और मनन करते हुए उनके गुण-दोषों का विश्लेषण करता है। हम यह भी कह सकते हैं कि इससे उनमें सत्य-असत्य का ज्ञान,अच्छे और बुरे में अंतर करना आदि आता है।

बहुत से विद्वान साथी बाल-साहित्य की उपादेयता पर प्रश्न चिह्न लगाते हैं। उनका कहना है, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के युग में जब बच्चों के हाथ में रिमोट है, मोबाइल और अन्य नवीन संसाधन हैं तब वह राजा-रानी की कहानियों, परीकथाओं, जंगली पशु-पक्षियों से संबंधित सामग्री में अपना ध्यान क्यों लगाएँगे। यहां हमें यह जानने और समझने की आवश्यकता है कि इंटरनेट और मोबाइल के युग में बचपन खोता जा रहा है और चिंताएँ बढ़ती जा रही हैं । एकल परिवार में बच्चा अकेला हो गया है। कामकाजी माता-पिता और बच्चों के बीच में संवादहीनता पनप रही है। बच्चे अपने अकेलेपन से जूझ रहे हैं या एकाकीपन को दूर करने के लिए टी . वी. मोबाइल और वीडियो गेम का सहारा ले रहे हैं,आत्मघाती हो रहे हैं। संवेदनाओं का स्थान अब क्रूरता लेती जा रही है। इन परिस्थितियों में आज बाल साहित्य और बाल साहित्यकार का दायित्व बहुत अधिक बढ़ जाता है। आज यह एक बड़ी चुनौती है कि बच्चों में मानवीय मूल्यों को रोपण कैसे करें? बच्चों को किस तरह दिशा प्रदान करें?
वर्तमान परिवेश में सूचनाओं का विस्फोट हो रहा है। यत्र-तत्र जानकारियाँ बिखरी हुई हैं। बच्चे एक क्लिक करके समाधान पाने की कोशिशि करते हैं । आज के बच्चों में कल के बच्चों की तुलना में जानकारियों तक पहुंच अत्याधिक है। किन्तु ये सारी जानकारियाँ ज्ञान नहीं हैं।
 इन जानकारियों से समझ विकसित नहीं हो पा रही है। समझ विकसित करने के लिए बच्चों को सकारात्मक चिंतन की ओर ले जाने की आवश्यकता है और यही कार्य बाल-साहित्य का है।
आज के बच्चों की जिज्ञासाएँ असीमित हैं , अपेक्षाएं बढ़ीं हैं, उनमें परिकल्पनाओं के नवीन पंख उग आये हैं, उनकी  उनकी इन आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु बाल साहित्यकारों को ही आगे आना होगा। वैसे बाल-साहित्य न कभी मौन रहा है और न रहेगा। बाल-साहित्यकारों को बाल-मनोविज्ञान को समक्ष रखकर बच्चों की आवश्यकताओं और जिज्ञासाओं के अनुरूप बाल-साहित्य रचने की आवश्यकता है। यदि हम यह कहते हैं कि सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में बच्चे को आज की आवश्यकता के अनुरूप सामग्री चाहिए, तो बाल-साहित्यकार को भी विज्ञान से जुड़ी हुई, वर्तमान समय की मांग के अनुसार कथा कहानी, कविता या अन्य सामग्री उपलब्ध कराने के आवश्यकता है। आज के बच्चे वैश्विक बाजारवाद के चपेट में आते जा रहे हैं। वे टी.वी . में प्रचारित लोक-लुभावन विज्ञापन को देखते हैं और उसी के अनुरूप  सपने  पालते हैं। यह समझने की आवश्यकता है कि बाल-साहित्य की कौन-सी विधा है, जो उनके सपनों के आसपास की है। इसके लिए वर्तमान में उपलब्ध बाल-साहित्य का विश्लेषण करने की आवश्यकता है और विश्लेषण के पश्चात् जो रिक्तता है, उसे भरने की भी, ताकि आज के जिज्ञासु बच्चे अपनी अपेक्षा के अनुरूप सामग्री का चयन कर सकें।
मैं अंत में एक बात और कहना चाहूँगा जब हम यह कहते है कि बच्चा अब बच्चा नहीं रह गया है, वह ज्ञान के क्षेत्र में प्रौढ़ है तो आज के ऐसे समर्थ बच्चे को हम क्या दें। हमें समाज की मनोदशा को समझना पड़ेगा। क्या वर्तमान समाज बच्चों को बच्चे रहने देना चाहता है? क्या वह उनमें मानवीय मूल्यों को स्थापित करना चाहता है? क्या वह बच्चों को अपने मन का कुछ करने की आजादी देना चाहता है? आज बच्चा पैदा हुआ नहीं कि उस पर जिस तरह पढ़ाई का बोझ लादा जा रहा  है, वह कितना उचित है? आज के विद्यालय बच्चों को मशीन बना दिये हैं । परीक्षा के परिणाम ही बच्चों की सफलता के मानक हो गये हैं । इन परिस्थितियों में भी बाल-साहित्य की उपलब्धता और पहुँच पर विचार करने की आवश्यकता है।
बाल-साहित्यकार का उद्देश्य केवल सामग्री का निर्माण ही नहीं है, उसकी उपलब्धता और पहुँच पर भी विचार करना भी है, शायद मेरी इस बात से आप सहमत न हों ? लेकिन आज का बालक और बाल-साहित्य दोनों ही बातों पर विचार करना होगा। पहला उनकी अपेक्षा के अनुरूप साहित्य सृजन और दूसरा उस साहित्य की बच्चों तक पहुँच।तब ही हम आज के बच्चों को समाज के लिए उपयोगी नागरिक बना सकेंगे।
-बलदाऊ राम साहू
दुर्ग, छत्तीसगढ़
मोबाइल-9407650458
मेल- br.ctd1958@gmail.com