विज्ञान लेखन की समस्याएँ और संभावनाएँ
बलदाऊ राम साहू
हिन्दी भारत की राजभाषा है, किंतु यह हमारा दुर्भाग्य है कि आज अधिकतर लेखक अपनी बात हिन्दी भाषा में लिखने में संकोच करते हैं और अंग्रेजी में लिखकर अपने आपको गौरवान्वित महसूस करते हैं। विज्ञान लेखन के क्षेत्र में तो यह प्रवृतियाँ और अधिक देखी जाती है। अधिकतर वैज्ञानिक अपना काम अंग्रेजी में संपादित करते हैं, शोध आलेख अंग्रेजी में लिखते हैं और पढ़ते हैं। शायद उन्हें हिन्दी में सोचने का समय ही ना मिलता होगा! अंग्रेजी उनके दिलोदिमाग में घर कर गया है। वे अंग्रेजी के मोहजाल से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। यही कारण है कि हिन्दी में लेखन की संभावनाएँ समाप्त होती जा रही हैं, जो कि हर भारतीय के लिए चिंता का विषय है।
अधिकतर पढ़े लिखे लोग अंग्रेजी में पढ़ने, लिखने व कार्य करने में गर्व महसूस करते हैं और अपने को सम्मानित भी। किंतु यह समझना होगा कि इस हम तरह कहीं हिन्दी भाषा की उपेक्षा तो नहीं कर रहे हैं ? यदि यही चलता रहा तो हिन्दी लेखन की संभावनाएँ समाप्त हो जाएगी और हम हाथ मलते रह जाएँंगे। विज्ञान लेखन तो दूर हम हिन्दी में इतिहास और भूगोल भी नहीं लिख पाएँगे और आने वाले पीढ़ी भाषायी विकलांगता महसूस करेगी।
प्रायः देखा जा रहा है कि आने वाले पीढ़ियों में हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं में विज्ञान पढ़ने वालों की संख्या कम होती जा रही है। इसे हम बदलते वक्त का तकाजा कहें या पश्चिम का अंधानुकरण। दरअसल वह समय आ गया है जब आने वाली पीढ़ी को अपनी मातृभाषा में काम करने की शुरूआत करनी होगी। इससे न केवल भाषा समृद्ध होगी, बल्कि हममें आत्मगौरव का विकास भी होगा।
अक्सर सवाल उठाया जाता है कि यदि हम विज्ञान को अंग्रेजी के अतिरिक्त हिन्दी व अन्य क्षेत्रीय भाषा में पढ़ें व लिखें तो उसकी वैज्ञानिक शब्दावलियाँ नहीं मिल पाती। यह शायद हमारे मन का भ्रम है। जब लेखन ही नहीं होगा तो शब्द आएँगे कहाँ से? शब्दों का आविष्कार आवश्यकता पर निर्भर होता है। जब आवश्यकता महसूस होगी, तब उन तकनीकी शब्दों के लिए नवीन शब्द भी गढ़े जाएँगे। वे शब्द प्रचलन में आएँगे और भाषा को समृद्ध करेंगे। सतत् लेखन से ही भाषा समृद्ध होगी और लेखन की संभावनाएँ विकसित होंगी। कुछ लेखकों का यह भी मानना है कि हिन्दी में तकनीकी शब्दावलियाँ क्लिष्ट होती हैं, यह भी विचारणीय प्रश्न हो सकता है।
हिन्दी में विज्ञान लेखन हेतु वर्तमान में हिन्दी भाषी विज्ञान लेखकों को वैज्ञानिक शब्दावली विकसित करने तथा हिन्दी भाषा के क्लिष्ट वैज्ञानिक शव्दावलियों को रूपांतरित कर सहज बनना होगा। उदाहरण के लिए भौतिकी में अंग्रेजी शब्द तमसनबजंदबम का हिन्दी पर्याय प्रतिष्टम्भ होता है, जो दुरूह कहा जा सकता है। यदि यह सही में दुरूह है, तो इसे सहज करने के लिए विकल्प भी तलाशना होगा और हिन्ही भाषा के वैज्ञानिक शब्दावली से प्रतिस्थापित करना होगा। इस विषय पर यह भी समझने की आवश्यकता है कि जब तक शब्द प्रचलन में नहीं होगें, तो क्लिष्टता का भान होगा ही, शब्द महज ध्वनियाँ नहीं होती शब्द संस्कृति का हिस्सा होता है। वह मानय पटल पर रचा-बसा होता है। शब्द प्रयोग में आते हैं तबे उनका नवीन संसार बनता है। शब्दों का एक बड़ा संसार होता है। विज्ञान लेखन के संदर्भ में हमें उसकी उत्पत्ति और प्रभुत्व को समझना होगा। हिन्दी भाषा में विज्ञान लेखन की संभावना को तलाशने के लिए भाषायी गौरव को जगाने की भी आवश्यकता है। तभी आगे चलकर हिन्दी भाषा में विज्ञान विषय पर लेखन किया जा सकेगा।
सहायक संचालक
आदिम जाति अनुसूचित जाति विकास विभाग, इंद्रावती भवन, नया रायपुर, छत्तीसगढ़
बलदाऊ राम साहू
हिन्दी भारत की राजभाषा है, किंतु यह हमारा दुर्भाग्य है कि आज अधिकतर लेखक अपनी बात हिन्दी भाषा में लिखने में संकोच करते हैं और अंग्रेजी में लिखकर अपने आपको गौरवान्वित महसूस करते हैं। विज्ञान लेखन के क्षेत्र में तो यह प्रवृतियाँ और अधिक देखी जाती है। अधिकतर वैज्ञानिक अपना काम अंग्रेजी में संपादित करते हैं, शोध आलेख अंग्रेजी में लिखते हैं और पढ़ते हैं। शायद उन्हें हिन्दी में सोचने का समय ही ना मिलता होगा! अंग्रेजी उनके दिलोदिमाग में घर कर गया है। वे अंग्रेजी के मोहजाल से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। यही कारण है कि हिन्दी में लेखन की संभावनाएँ समाप्त होती जा रही हैं, जो कि हर भारतीय के लिए चिंता का विषय है।
अधिकतर पढ़े लिखे लोग अंग्रेजी में पढ़ने, लिखने व कार्य करने में गर्व महसूस करते हैं और अपने को सम्मानित भी। किंतु यह समझना होगा कि इस हम तरह कहीं हिन्दी भाषा की उपेक्षा तो नहीं कर रहे हैं ? यदि यही चलता रहा तो हिन्दी लेखन की संभावनाएँ समाप्त हो जाएगी और हम हाथ मलते रह जाएँंगे। विज्ञान लेखन तो दूर हम हिन्दी में इतिहास और भूगोल भी नहीं लिख पाएँगे और आने वाले पीढ़ी भाषायी विकलांगता महसूस करेगी।
प्रायः देखा जा रहा है कि आने वाले पीढ़ियों में हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं में विज्ञान पढ़ने वालों की संख्या कम होती जा रही है। इसे हम बदलते वक्त का तकाजा कहें या पश्चिम का अंधानुकरण। दरअसल वह समय आ गया है जब आने वाली पीढ़ी को अपनी मातृभाषा में काम करने की शुरूआत करनी होगी। इससे न केवल भाषा समृद्ध होगी, बल्कि हममें आत्मगौरव का विकास भी होगा।
अक्सर सवाल उठाया जाता है कि यदि हम विज्ञान को अंग्रेजी के अतिरिक्त हिन्दी व अन्य क्षेत्रीय भाषा में पढ़ें व लिखें तो उसकी वैज्ञानिक शब्दावलियाँ नहीं मिल पाती। यह शायद हमारे मन का भ्रम है। जब लेखन ही नहीं होगा तो शब्द आएँगे कहाँ से? शब्दों का आविष्कार आवश्यकता पर निर्भर होता है। जब आवश्यकता महसूस होगी, तब उन तकनीकी शब्दों के लिए नवीन शब्द भी गढ़े जाएँगे। वे शब्द प्रचलन में आएँगे और भाषा को समृद्ध करेंगे। सतत् लेखन से ही भाषा समृद्ध होगी और लेखन की संभावनाएँ विकसित होंगी। कुछ लेखकों का यह भी मानना है कि हिन्दी में तकनीकी शब्दावलियाँ क्लिष्ट होती हैं, यह भी विचारणीय प्रश्न हो सकता है।
हिन्दी में विज्ञान लेखन हेतु वर्तमान में हिन्दी भाषी विज्ञान लेखकों को वैज्ञानिक शब्दावली विकसित करने तथा हिन्दी भाषा के क्लिष्ट वैज्ञानिक शव्दावलियों को रूपांतरित कर सहज बनना होगा। उदाहरण के लिए भौतिकी में अंग्रेजी शब्द तमसनबजंदबम का हिन्दी पर्याय प्रतिष्टम्भ होता है, जो दुरूह कहा जा सकता है। यदि यह सही में दुरूह है, तो इसे सहज करने के लिए विकल्प भी तलाशना होगा और हिन्ही भाषा के वैज्ञानिक शब्दावली से प्रतिस्थापित करना होगा। इस विषय पर यह भी समझने की आवश्यकता है कि जब तक शब्द प्रचलन में नहीं होगें, तो क्लिष्टता का भान होगा ही, शब्द महज ध्वनियाँ नहीं होती शब्द संस्कृति का हिस्सा होता है। वह मानय पटल पर रचा-बसा होता है। शब्द प्रयोग में आते हैं तबे उनका नवीन संसार बनता है। शब्दों का एक बड़ा संसार होता है। विज्ञान लेखन के संदर्भ में हमें उसकी उत्पत्ति और प्रभुत्व को समझना होगा। हिन्दी भाषा में विज्ञान लेखन की संभावना को तलाशने के लिए भाषायी गौरव को जगाने की भी आवश्यकता है। तभी आगे चलकर हिन्दी भाषा में विज्ञान विषय पर लेखन किया जा सकेगा।
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आदिम जाति अनुसूचित जाति विकास विभाग, इंद्रावती भवन, नया रायपुर, छत्तीसगढ़
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