Wednesday, 31 October 2018

सुरुज नवा उगा के देखन

सुरुज नवा उगा के देखन,
अँधियारी भगा के  देखन।

रोवत रहिथे   कतको इहाँ,
उनला हम हँसा के देखन।

भीतर मा सुलगत हे आगी,
आँसू  ले  बुझा  के  देखन।

कब तक रहहि दुरिहा-दुरिहा,
संग  ओला  लगा  के  देखन।

दुनिया  म कतको  दुखिया हे,
दुख ल ग़ज़ल बना के देखन।

बलदाऊ राम साहू
प्यार     गँवागे,
बढ़गे   नफरत।

मनखे     लोभी,
उनकर फितरत।

सच    के   रद्दा,
हावै     आफत।

चारो        डहर,
गफलत-गफलत।

ये   दुनिया  मा,
दुखिया औरत।

इहाँ  कौन  ला,
हावै   फुरसत।

गदहा     खावै,
हर दिन दावत।

‘बरस’ कौन कर,
करें   शिकायत।

बलदाऊ राम साहू
ग़ज़ल

छत्तीसगढ़ी

कौन  हाँसही,  कौन  ह गाही,
कौन हर अपन धरम निभाही।

नाव बिना, पतवार  बिना जी,
कौन  हर  गंगा  ल  नहकाही।

जग के  खेवनहार  जउन हे,
उनला   केंवट  पार  लगाही।

सपट के बइठे इहाँ  सिकारी,
कइसे  पंछी   मन  हर गाही।

सबके सब बइठांगुर  हे  तब,
सरहद कौन लड़े  बर  जाही।

 बलदाऊ राम साहू
सपट= छुपकर, बइठांगुर= निकम्मा।