Monday, 5 September 2016

सामाजिक विसंगतियों पर कविता

हम सब को बूढ़ी लगती है
घर की राधा रानी
हरदम याद सताती है
शीला की जवानी.

कथा-पुराण सब व्यर्थ हुए
शास्त्र हुए निरर्थक
टी वी के सिरियल लगते
इस भुवन में सार्थक
हमको तो भाती नहीं है
दादी की कहानी.

ग्वाल-बाल  सब सखा रह गए
गोकुल वृंदावन में
रास नहीं होता है अब तो
गोपी संग मधुवन में
राधा के निच्छल प्रेम की
कथा हुई पुरानी.

धर्म, कर्म और नैतिकता
संबंध सभी नि:सार
भोग-बिलास में डूबा हुआ है
पूरा यह संसार
कुरुक्षेत्र में कौन सुनेगा
अब गीता की वाणी.

राग-द्वेष और छल-प्रपंच  से
सब का नाता है
पर निंदा, पर दोष गिनाना
सब को भाता है.
संबंधों की परिभाषा गढ़ना
लगती है बेईमानी.

-बलदाऊ राम साहू
   मो 9407650458

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