छत्तीसगढ़ी लोक गीत ददरिया
छत्तीसगढ़ी लोक साहित्य में ददरिया का महत्वपूर्ण स्थान है. यह लोक काव्य के रूप में कंठ-कंठ मैं बसता है. किसी समय में यह श्रम परिहार का माध्यम हुआ करता था, तो कभी प्रणय निवेदन का सशक्त सशक्त साधन. प्रेमी युगल इस लोक गीत के माध्यम से सहज रूप में अपने भावों को अभिव्यक्त करते थे. यदि साहित्यिक दृष्टिकोण से विश्लेषण करें तो ददरिया का बिंब विधान अनूठा जान पड़ता है. इसका छंद भी अनोखा है. इसका प्रत्येक पद दोहे की भाँति अपने आप में पूर्ण होता है. इसका पहला और दूसरा चरण केवल तुक मिलाने के लिए कहा जाता है, जबकि तीसरे और चौथे चरण में पूरी बात कही जाती है.
ददरिया को हम वर्णिक छंद कह सकते हैं. किन्तु इसमें पर्याप्त भेद हैं. लोक गायकों के द्वारा गाये गये ददरिया स्वरागम पर आधारित दिखाई देता है. ददरिया के मूल पद को गाने के पहले घोर(मुखड़ा) होता है. घोर के आधार पर ही पदों की स्वर रचना की जाती है.
उदाहरण के लिए एक स्वरचित ददरिया प्रस्तुत है. यह मात्र एक उदाहरण है -
लड़का - हमर गाँव तीर वो,
अमुआ बगीचा हमर गाँव तीर.
लड़की - हमर गाँव तीर गा,
नदिया कछार हमर गाँव तीर.
लड़का-पीपर रूख मा बइठे हे पंछी,
तैं राधा बन जा गोई, बजाहूँ बंसी.
लड़की-धाने ला बोये हरियच्च-हरिया,
का कहत हावस बाबू बनेच्च फरिहा.
लड़का- तेल-तेलाई तैं बनेच्च करले
तोर अँछरा मा गोई मया ला धरले.
लड़की-गये ल जंगल टोरे ला तेंदू-चार
मिलजुल के हम करबोन, मया के बइपार.
लड़का - माटी मताये पैरोसी धरले
मोर बाते के गोई भरोसी करले.
लड़की- बँबूरी के रूख मा काँटच्च-काँटा
मोर मया के तैं संगी झन करबे बाँटा.
बलदाऊ राम साहू
मो 9407650458
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