Tuesday, 9 September 2014

बोलना मना है दोस्तों। 


है दाँत मगर, अब नहीं चना है दोस्तों,
बातें बहुत हैं, बोलना मना है दोस्तों।

चंदा की चाँदनी तो रात में है आज भी,
है अंधियारा, बादल घना है दोस्तों।

नहीं है कोई कातिल कहता है जमाना,
हरेक  हाथ खून से सना है दोस्तों।

पाने के लिए मंजिल निकले हुए हैं लोग
वो रास्ता मगर नहीं बना है दोस्तों।

झुकने लगी है रीढ़, जमाने की अब मगर,
ये आदमी बिना वजह, तना है दोस्तों।

मिलते नहीं हैं लोग बहुत भीड़ है यहाँ,
अब हैसियत पहचानना मना है दोस्तों।

Monday, 8 September 2014

चिडि़या



चिडि़या चुन-चुन तिनके लाती,
फिर उनसे वह नीड बनाती।

रोज सजाती सुंदर सपने 
बैठ घोसले में वह अपने।

बच्चों का होगा संसार
खूब करूँगी उनसे प्यार ।

दाने चुन-चुनकर लाऊँगी
स्वयं उन्हें मैं चुगवाऊँगी।


फिर वे डैने फैलाएँगे
अंबर में उड़-उड़ जाएँगे।

Saturday, 6 September 2014

उठो-उठो
                    


 मुर्गा बोला उठो-उठो तुम, उठो-उठो
प्रथम पहर है, उठो दिवस अब आया,
बुला रही है प्रात पवन अब उठो-उठो
चिडि़यों ने मधुर-मधुर है गीत सुनाया।

उठो-उठो अब बुला रहे हैं वृक्ष-लताएँ
जाग गया हैं यह जग सारा उठो-उठो।
उठो-उठो सूरज ने बाँहें फैला दी हैं
कितने करने काम अनोखे उठो-उठो।

कृषक बैल को हाँक रहा है, उठो-उठो
अवसर तुम से भाग रहा उठो-उठो।
भर लेना जीवन में खुशियाँ विश्राम नहीं
जीवन का उत्कर्ष आ गया उठो-उठो।

कठिन राह को सरल बनाने उठो-उठो
नव प्रात में भाग्य सजाने उठो-उठो
उठो उठो हर स्पंदन में आशाएँ हैं
जीवन को उत्सव मय करने उठो-उठो।

Friday, 5 September 2014

गिरगिट की तरह रंग बदलता है आदमी

गिरगिट की तरह रंग बदलता है आदमी,
सांपों-सा आस्तीन में पलता है आदमी ।

वो है रंगा सियार कहानी में जो रहा,
चालें भी लोमड़ी-सी चलता है आदमी।

जिस डाल पे बैठा है उसे काटता है वो,
अपने किए पे हाथ फिर मलता है आदमी।

पा तो लिया महारत, वो दुम हिलाने में
फिर भी यहाँ वहाँ पे उछलता है आदमी।

मुँह खून से सना है देखो जरा उसे,
गिद्धों की बस्तियों में पलता है आदमी।

कर ली है दोस्ती भी उसने अंधेरे से
सूरज से सुबह के भी जलता है आदमी।

बहुरूपियों का रूप धर लिया है उसी ने,
खुद को न जाने क्यूँ अब छलता है आदमी।


सूरज को दिया दिन में दिखाने लगा है वो,
हर रोज व्यर्थ मोम सा गलता है आदमी।

Tuesday, 2 September 2014

बेटियाँ पढ़ेंगी

बेटियाँ पढ़ेंगी
इतिहास वो गढ़ेंगी
विकास की सौ-सौ
सीढि़याँ चढ़ेंगी।

कदम-कदम मिलाकर 
नाप नए रास्ते
देश के भविष्य को
संवारती चलेंगी।

एक नए सूरज-सा
तमस को मिटाकर
नव प्रभात की, वो
रोशनी बनेंगी।

युग नया आएगा
ऐसा संकल्प है
आसमां छुने के
सपने बुनेंगी।
बंधनों को तोड़कर
मुक्त गगन में 
पंख फैलकर 
निर्भय उड़ेंगी।

तपकर ही सोना 
कुंदन कहलाता है,
साँचे में ढलकर 
गहने वो बनेंगी।


रिश्तों का अहसास 

धरती प्यासी रह गई, रूठा जब आकाश।
क्यूँ फीका-सा लग रहा, रिश्तों का अहसास।

छीन लिया बाजार ने, गाँवों के वो भाव।
पत्थर बनता शहर है, बचा न कुछ भी पास।

जंजीरों से बँधी हुई, बेटी का संसार। 
जोह रही है बाट वो, मन में लेकर आस।

भाषण से वे नापते, लोगों के ज़ज़्बात।
विज्ञापन-सा लग रहा, अपनों का विष्वास।

पंछी कब आकाष में, उड़ पाते उन्मुक्त।
छुपकर बैठे बहेलिये, उनके ही आवास।

कंधों पर हल था कभी, उन पर अब बंदुक।
धरती की आँखें सजल, ओंठों पर है प्यास।


बेटे ने बनवा लिया, अपना इक संसार।
गुमसुम बूढ़ा बाप है, मां का हृदय उदास।

गली-गली में चल रहा , सपनों का व्यापार।
घीसू अब भी कर रहा, एक जुनिया उपवास।