Thursday, 16 July 2015

सारा जीवन बीत गया


लिखा हुआ है नाम सभी का
दाने-दाने में
सारा जीवन बीत गया, अब 
भार उठाने में
बचपन के वे खेल तमाशे
यौवन का उल्लास
रेतकणों-सा बिखर गया
अब तो मन उदास
लगा रहा अनसूलझे प्रश्नों के
उत्तर पाने में ।

मन में एक आस बँधी थी
कल को सुघर बनाने
नन्हे कल के साथ फिर से
सपने नए सजाने
कल क्या, धूप-छाँव है?
लगा मुझे अनजाने में ।




पंछी के संग उड़ चला मैं
आसमान की ओर
उड़ते गया पर कहीं न मिला
पाना था जिस छोर
सारा जीवन बीत गया
एक नीड बनाने में।