घुप अँधियारी छाये हे, उजियारी कर,
एकहौवा नइ सकस तब, ओरी-पारी कर.
बीर सिपाही मन सरहद म हँस-हँस के मरथें
देस के खातिर तहूँ हर, जंग जारी कर.
आज उही जिथे जग म जेकर भुजा ताकत हे
सुभिमान संग जिये के, जम के तैयारी कर.
पग-पग म काँटा बगरे हे, रद्दा ल चतवार,
जिनगी ल जिये बर थोरिक तो हुसियारी कर.
कोन अइसन बस्ती जिहाँ, नइ हे सुरुज-चाँद
देख अपन ल तैं हर, दूसर के झन चारी कर.
@बलदाऊ राम साहू
एकहौवा नइ सकस तब, ओरी-पारी कर.
बीर सिपाही मन सरहद म हँस-हँस के मरथें
देस के खातिर तहूँ हर, जंग जारी कर.
आज उही जिथे जग म जेकर भुजा ताकत हे
सुभिमान संग जिये के, जम के तैयारी कर.
पग-पग म काँटा बगरे हे, रद्दा ल चतवार,
जिनगी ल जिये बर थोरिक तो हुसियारी कर.
कोन अइसन बस्ती जिहाँ, नइ हे सुरुज-चाँद
देख अपन ल तैं हर, दूसर के झन चारी कर.
@बलदाऊ राम साहू
No comments:
Post a Comment