Friday, 16 January 2015

सुख के गीत ल गावन दे


जब निकारे लोक परभाती, गीत नवा ल गावन दे।
बिमत ल सियार मा छोड़, सुमत के गाँठ बँधावन दे।

दुख-पीरा के नइ स्ंागवारी, सुख के सबो मितान हे।
दुख ल आँखी म पी के, सुख के गीत ल गावन दे।

अपन मरे म सरग दिखथे, हाना कहिथे सुजान मन।
अपने हाथ मा गोड़ ल सार के, पीरा ल भुलावन दे।

बेंदरा बिनास तब हो जाथेे, जब घर मा बिपत आथे।
आगी झन सपचाओं कोनो, पलपला ल जुड़ावन दे।

बिहनिया सूरुज के आवत, घपटे अंधियारी भगा जाथे।
हमुमन कुछू उजियार करन, एकठन दीया जलावन दे।

अपने जाँध उघार के कोन, का अपन मान बचाये हे?
कुटिल कपटी ये दुनिया हे, ‘बरस’ सबला बतावन दे।





















मनखे मन तो हिम्मत हार बइठे हे।


कोनो काम झन करव सरकार बइठे हे।
मुफत जिनिस मिलही, बजार बइठे हे।

जउन बोंथे उही हर काटथे फसल।
फोकट पाये बर सब तियार बइठे हे।

जउन खोजथे उही हर पाथे मोती।
अलाल मन सबो नदी पार बइठे हे।

कुकरा के बासे ले नइ निकले सुरुज।
धोखा म मनखे सब बेकार बइठे हे।

गांव-गांव मा खुले हे कलारी गजब।
संग देवईया उहाँ दू-चार बइठे हे।

कोनो बखत आ सकत हे मउत वो तुंहर।
मुहाट मा तो तोर दगादार बइठे हे।

कोनो ल तो झन समझा तैं ‘बरस’।
मनखे मन तो हिम्मत हार बइठे हे।






हर रोज जलालत सहती नारी,
कभी न वो कुछ कहती नारी।

घूँघट के बीच अपनी पीड़ा को,
अनकहे ही सब कहती नारी।

इतिहास ने बना दिया बे-जुबाँ,
‘अथ’ मौन अभी भी रहती नारी।

लगा दो ज़ख़्मों पर वो मरहम,
अनजाने क्या-क्या सहती नारी।

खुली नज़रों से देखो उन्हें,
नदियों-सी ही बहती नारी।

दे दो उन्हें कहने की आजादी,
गीता वो कुरान कहती नारी।