Monday, 22 June 2015



हम तो ठगे हुए हैं

स्वर्णमृग पा लेने के
सपने सजे हुए हैं।
मरूभूमि में मृगतृष्णा-सी
हम तो ठगे हुए हैं।
राजनीति की कंठीमाला
यूँ सबको भरमाते
जो भी लेता उसे हाथ में
वे शीश तक डूब जाते
इसकी माया अदभुत है
सभी फँसेे हुए हैं।
अवसरवादी आते-जाते
मिथ्या राग अलापें
चिकनी-चुपड़ी बातें करके
उल्टा काठा नापें
लालच के इस महापंक में
पूरे धँसे हुए हंै।
रामायण से महाभारत तक
इसकी कथा पुरानी
न कोई है दद्दा-भैया
रिश्ते सभी बेमानी
तार-तार सब संबंधों के
उलझे पड़े हुए हैं।
@बलदाऊराम साहू

Tuesday, 16 June 2015

बाल साहित्य से

चिडि़या

चिडि़या चुन-चुन तिनके लाती,
फिर उनसे वह नीड बनाती।
रोज सजाती सुंदर सपने
बैठ घांेसले में वह अपने।
बच्चों का होगा संसार
खूब करूँगी उनसे प्यार ।
दाने चुन-चुनकर लाऊँगी
स्वयं उन्हें मैं चुगवाऊँगी।
फिर वे डैने फैलाएँगे
अंबर में उड़-उड़ जाएँगे।