Wednesday, 26 August 2015

चलो साथ-साथ


मन के भीतर
दबी हुई हैं
कुत्सित इच्छाएँ
उन्हें मिटाएँ
नव पथ पर
चलो साथ-साथ
कदम बढ़ाएँ।

मन बोझिल है
तो दुश्चिंताएँ
बढ़ जाती हैं
अर्थहीन बातों से
शांति
कहीं खो जाती है
समर नहीं
शांति हेतु
शंख बजाएँ।

अर्जुन का मन
विचलित जब
हो जाता है
कुरुक्षेत्र में कृष्ण
उन्हें समझाता है
जब मर्यादाएँ
खंड-खंड हो जाएँ
बिन बूझे
धनुष उठाएँ।

मन के भीतर
स्वारथ के
बीज उग आते हैं
तभी गुरु द्रोण
चक्रव्यूह बनाते हैं
स्वारथ छोड़
परमारथ को
गले लगाएँ
सिद्धार्थ से
बुद्ध गौतम बन जाएँ
@बलदाऊ राम साहू

Tuesday, 11 August 2015

चलव गीत ल गा के देखन,



चलव गीत ल गा के देखन,
अंतस ल भुलिया के देखन।
सुख अउ दुख तो आथे-जाथे,
कभू हँसाथे कभू रोवाथे।
मन के पीरा मित बनथे जब
अपने अपन वो गोठियाथे।

ये सब के पाछू मा का हे ?
चिटिक हमू फरिया के देखन।

चार दिन बर चंदा आथे
फेर अँधियारी समा जाथे
ये जिनगी के घाम-छाँव
दुनिया भर ला भरमाथे।
जिनगी के मतलब जाने बर
दुख-पीरा टरिया के देखन।

जिनगी सरग बरोबर होथे
सुख हर जब सकला जाथे
मन उछाहित हो जाथे जब
बिछुरे कोनो अपन मिल जाथे
ये जिनगी के नार-फाँस ला
थोरिक हम धिरिया के देखन।

सावन-भादो म रुख-राई मन
पानी पा के हरिया जाथे
चिरई-चिरुगुन, फाँफा-मिरगा
हाँस-हाँस के गीत सुनाथे।
मुरझाये जिनगी ला संगी
चलव हमू हरिया के देखन।
@बलदाऊ राम साहू


बाल साहित्य से

बिन बरसे मत जाना बादल

करना नहीं बहाना बादल
बिन बरसे मत जाना बादल
सूख गई हैं धरती सारी
अब मत तू इतराना बादल।
मोर-पपीहा बाट देखते
उनको भी हर्षाना बादल
नन्हीं-नन्हीं बूदों के संगइंद्रधनुष दिखलाना बादल।

मत आना तुम चोरीे-छुपके
अतिथि बनकर आना बादल
भरकर खुशियाँ की झोली को
छम-छम बँूदें लाना बादल।
मेरा आँगन बहुत बड़ा है
यहीं ठहरने आना बादल
मैं खेलूँगी छप-छप-छप-छप
बिन बरसे मत जाना बादल।
@बलदाऊ राम साहू

मौन बस्तर की माटी

पंछी मौन हैं, लोग मौन हैं,
मौन बस्तर की माटी।
गौर श्रृंग से आभूषित थे
उल्लसित था मन
हँसमुख था उनका चेहरा
ताँबिया जैसा तन
गलबैहाँ डाले चलतीं थीं
बालाएँ मारे पाटी।
सन्नाटा-सा बना हुआ है
बीहड़ शाल वनों में
विकट उदासी कैसी मन में
भय का ज्वर जनों में
जंगल के सब पेड़ मौन है
पर्वत नदियाँ घाटी।
मातु-पितु से वंचित हुए
कितने नन्हे बच्चें
कितनों की आँख खुली थी
कितने अभी अधकच्चे
देशहित में काम जब आते
फूलती अपनी छाती।

Thursday, 16 July 2015

सारा जीवन बीत गया


लिखा हुआ है नाम सभी का
दाने-दाने में
सारा जीवन बीत गया, अब 
भार उठाने में
बचपन के वे खेल तमाशे
यौवन का उल्लास
रेतकणों-सा बिखर गया
अब तो मन उदास
लगा रहा अनसूलझे प्रश्नों के
उत्तर पाने में ।

मन में एक आस बँधी थी
कल को सुघर बनाने
नन्हे कल के साथ फिर से
सपने नए सजाने
कल क्या, धूप-छाँव है?
लगा मुझे अनजाने में ।




पंछी के संग उड़ चला मैं
आसमान की ओर
उड़ते गया पर कहीं न मिला
पाना था जिस छोर
सारा जीवन बीत गया
एक नीड बनाने में।

Monday, 22 June 2015



हम तो ठगे हुए हैं

स्वर्णमृग पा लेने के
सपने सजे हुए हैं।
मरूभूमि में मृगतृष्णा-सी
हम तो ठगे हुए हैं।
राजनीति की कंठीमाला
यूँ सबको भरमाते
जो भी लेता उसे हाथ में
वे शीश तक डूब जाते
इसकी माया अदभुत है
सभी फँसेे हुए हैं।
अवसरवादी आते-जाते
मिथ्या राग अलापें
चिकनी-चुपड़ी बातें करके
उल्टा काठा नापें
लालच के इस महापंक में
पूरे धँसे हुए हंै।
रामायण से महाभारत तक
इसकी कथा पुरानी
न कोई है दद्दा-भैया
रिश्ते सभी बेमानी
तार-तार सब संबंधों के
उलझे पड़े हुए हैं।
@बलदाऊराम साहू

Tuesday, 16 June 2015

बाल साहित्य से

चिडि़या

चिडि़या चुन-चुन तिनके लाती,
फिर उनसे वह नीड बनाती।
रोज सजाती सुंदर सपने
बैठ घांेसले में वह अपने।
बच्चों का होगा संसार
खूब करूँगी उनसे प्यार ।
दाने चुन-चुनकर लाऊँगी
स्वयं उन्हें मैं चुगवाऊँगी।
फिर वे डैने फैलाएँगे
अंबर में उड़-उड़ जाएँगे।

Thursday, 28 May 2015

यह कैसी लाचारी


सत्ता के इस मोह जाल में
धृतराष्ट्र फँस जाते
राजनीति के स्वार्थ-पंक में
यूँ ही वे धँस जाते
निज आँखों पर पट्टी बाँधी
सहती सब गांधारी।

दुर्योधन और दुःशासन जब
यूँ मद में हैं होते
पल-पल अपने जीवन में
वे गरल-बीज हैं बोते
क्या यह कुत्सित इच्छाएँं हैं
या मन की बीमारी?

कृपाचार्य गुरुद्रोण बली
जब चक्रव्यूह रचते हैं
समय बीत जाने पर वे भी
सिर्फ हाथ मलते हैं
हर युग में गुरु, आचार्यों की
यह कैसी लाचारी?

अपने ही संकल्पों से जब
भीष्म पराजित होते
अपनी ही भूलों के प्रतिफल
बारबार वे रोते
कभी-कभी अपना ही प्रण भी
स्व पर होता भारी।

यह कैसी लाचारी?

Thursday, 7 May 2015




 बेटियाँ


नए-नए सपने अब सजाती हैं बेटियाँ,
राग नए गीत गुनगुनाती हैं बेटियाँ।

घरों में फुदकती हंै चिडि़यों की तरह,
आसमान तक पर फैलाती हैं बेटियाँ।

सुबह के सूरज की तरह आती हैं ,
मन का उजास बन जाती हैं बेटियाँ।

बाँध नहीं सकती बेडि़याँ पाँव उनके,
खुषियाँ बनकर गुदगुदाती हैं बेटियाँ।

सिखाईं थीं उन्हें हर वक्त पाबंदियाँ,
हर रोज नए पाठ पढ़ाती हंै बेटियाँ।

बेटियों का सुख चारदीवारी में नहीं
सीमाओं पर बंदूक चलाती हैं बेटियाँ।

कलंकनी हो नहीं सकतीं कभी भी वे,
दो कुलों का मान बढ़ाती हैं बेटियाँ।






Friday, 24 April 2015

पंछी तुम 


दूर दूर तक विस्तारित है नील गगन,
पंछी। तुम पर फैला कर उड़ जाना
नहीं तुम्हें है डर किसी का अब रहा,
मुक्त कंठ से गीत खुशी के तुम गाना।

बाधाओं से मुक्त हो गई सब राहें,
अपनों से हैं लोग उन्हें तुम समझाना
बैशाखी की नहीं जरूरत है तुमको,
अनुपम और सुघर-सी प्रतिमा गढ़ जाना।

युगों-युगांे तक रहे सदा पिंजरे के पीछे,
शोषित, उपेक्षित रहे दलित पद के नीचे
आसमान को छू जाने का है साहस,
जग को तुम समर्थ भावों से भर जाना।

मन में रखना सदा इरादें फौलादी,
उदित सूर्य मंे कहीं ग्रहण न लग जाए
बिखर न जाएँ सूरज की चंचल किरणें,
सभी किरणों को इक मुठ्ठी में भर लाना।

Tuesday, 24 March 2015

दीपक जल जाने दो



उड़ने को आतुर है पंछी
उड़ जाने दो
मुक्त कंठ से गीत उन्हें
अब गाने दो

दुर्गम वन-कानन में ये
उड़ जाते हैं
निश्छल हो चंचलपन जब
दिखलाते हैं
अब तो भय की जंजीरों को
गल जाने दो

काल का पहिया यूँ ही
चलता जाता है
समय संग सूरज भी तो
ढल जाता है
अंधियारे से लड़ने दीपक
जल जाने दो

पर्वत हृदय का जल
नदिया बन जाता है
कलकल गंुजित स्वर में
छनकर आता है
अंतस की पीड़ा को आँसू
बन जाने दो

सावन की बूंदों से पौधे
उग आतेहैं
सहमी-सी पीढ़ी के वंशज
मुसकाते हैं
प्रातः नव कोमल किरणों को
आ जाने दो।
दीपक जल जाने दो


उड़ने को आतुर है पंछी
उड़ जाने दो
मुक्त कंठ से गीत उन्हें
अब गाने दो


Monday, 16 March 2015

खोता बचपन, बढ़ती चिंताएँ

बच्चों की कुछ सहज प्रवृत्तियाँ होती हैं। वे उन्हीं प्रवृत्त्यिों के आधार पर क्रियाएँ करते हैं। उनमें कुछ जिज्ञासाएँ होती हैं, जो उन्हें समस्त ब्रह्मांड को जानने के लिए उत्प्रेरित करती हैं। इसीलिए वे हर किसी वस्तु को छूकर देखते-परखते हैं। उनके मन में कुछ ऐसे प्रष्न कुलबुलाते हैं, जिन्हें जानने के लिए वे अपने बड़ों से पूछते हंै। उनके प्रश्नों के सहज हल नहीं मिलने पर वे कुछ नई क्रियाएँ करते हैं। ये क्रियाएँ बड़ों के लिए भले ही असहज और बेवकूफीपूर्ण हों, पर अपने प्रश्नों के समाधान तक पहुँचने के लिए उनकी यह सहज प्रवृत्तियाँ निरंतर क्रियाशील होती हंै। बाल-साहित्यकार श्री कृष्ण शलभ लिखते हैं-‘‘बाल-सुलभ प्रवृत्तियों में प्रमुख प्रवृत्ति है बाल-जिज्ञासा। बच्चा हर पल, हर घड़ी प्रश्नातुर रहता है। सारा ब्रह्मांड उसके लिए प्रष्न है। प्रश्न, हल और आगे प्रष्न उनकी उँगलियों पर रहते हैं।’’
वास्तव में ये बाल-सुलभ प्रवृत्तियाँ ही बचपन का आधार हैं। उनका विस्तार ही उसे एक सफल व्यक्तित्व बनने के लिए पे्ररित करता है। अपनी जिज्ञासाओं पर हस्तक्षेप उसे निरुत्साहित ही नहीं करता बल्कि उसके भीतर नकारात्मक दृष्टिकोण भी पैदा करता है। उनकी खेल-क्रियाओं में भी उनकी सृजनात्मकता दिखती है। वे अकेले में या अपने साथियों के साथ खेलते हुए तरह-तरह की क्रियाएँ करते हैं, जो उनके भीतर की अंतश्चेतना होती है। बच्चों की इन क्रियाओं के देखकर कभी-कभी हम अचंभित भी होते हैं। हमें ऐसा लगता है कि इन क्रियाओं को इन्होंने कैसा और कहाँ से जाना होगा। ऐसी ही बचपन की बहुत सी क्रियाएँ होती हंै जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता और वे स्मृतियों में बनी रह जाती हंै।        
 ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं होगा जिसकी स्मृतियों में बचपन की यादें न हों। हर कोई अपने बचपन के खुषनुमा पलों को याद करता है और उनमें खो जाना चाहता है। बचपन की वे शरारतें, खेल-खिलौने, संगी-साथी, सबके-सब अपनी ओर आकर्षित करते हैं। और आकषर््िात करें भी क्यूँ न? यही सब तो बचपन को यादगार बनाते हैं। सहज, चंचल, निश्छल स्वभाव, राग-द्वेष से परे, लोभ, संकोच से मुक्त जीवन बड़े होने पर फिर कहाॅं? निर्भय और निर्मुक्त, चिंताओं से कोसों दूर, बेपरवाह जीवन बचपन के बाद और कभी नहीं मिलता। मात्र चाहत ही रह जाती है कि काश, वह बचपन फिर लौट आता। पर यह संभव नहीं होता। 
आज से लगभग दो दशक पूर्व के बचपन और आज के बचपन में जो बदलाव आया है वह हम सबको चिंता में डाल रहा है। क्योंकि आज बचपन का मतलब ही कहीं खोते जा रहा है और चिंताएँ लगातार बढ़ती जा रही हंै। आज बच्चे के जन्म से पहले ही माता-पिता अपने बच्चे के भविष्य को लेकर चिंंितत होने लगे हैं। यह चिंता बच्चे के जन्म के बाद उनमें आरोपित होने लगती है और इसी गुणा-भाग में बचपन विलोपित होता चला जाता है। बच्चों की सहज खेल-क्रियाएँ भी प्री-प्लांड होने लगी हंै। कौन-सा खेल बच्चे के मानसिक विकास में सहायक होगा, उसे किस तरह के खिलौने दिए जाएँ आदि माता-पिता की अपनी रुचियों और समझ पर निर्भर करता है और उसी के आधार पर इनका चयन होता है। चाहे उसमें बच्चों की रुचि हो या न हो, उससे उनका कोई सरोकार नहीं होता। इस तरह हम देख पा रहे हैं कि बच्चे अब उन्मुक्त और सहज खेल-क्रियाओं सेे दूर होते जा रहे हैं।
बचपन में खेले जाने वाले छूप-छाँव, रेसटीप, छू-छूवाउल, पिट्ठूल, डंडा-पचरंगा, कबड्डी, खो-खो, फोदा, रस्सी दौड़, फुगड़ी, लंगड़ीकूद, बिल्लस आदि आँचलिक खेल केवल बच्चों के मनोरंजन के साधन मात्र नहीं होते थे, बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक विकास के साथ सामाजिक विकास में भी सहायक थे। बच्चे इन खेलों के माध्यम से कई तरह से योजना बनाने की कला में प्रवीण होते थे, आपस में रूठते-मनाते थे, यही नहीं उनके बहुत से खेलों में तो समाज का यथार्थ रूप भी देखने को मिल जाता था। छत्तीसगढ़ में खेले जाने वाले सगा-पहुना के खेल में पारिवारिक जीवन का यथार्थ चित्रण होता था। ये तमाम क्रियाएँ उनके भावी-जीवन के लिए कहीं न कहीं मददगार होती थीं। 
आज के पढ़े-लिखे माता-पिता अपने बच्चों को इन मौलिक और देशज खेलों से दूर करते जा रहे हैं। वे प्रकृति से दूर रखकर बच्चों के समग्र विकास की परिकल्पना कर रहे हैं। वे अपने बच्चों से इतना प्यार(?) करते हैं कि जिसकी परिकल्पना नहीं की जा सकती। वे नहीं चाहते कि उनके बच्चे मिट्टी से खेलें, उनके हाथ धूल से सनंे, उनके कपड़े गंदे हों। उन्हें यह डर होता है कि कहीं मिट्टी से खेलने से उनके बच्चों को ‘इंफेक्शन’ न हो जाए। वे इन खेलों को खेलना पिछड़ेपन की निषानी मानते हंै। नन्हे बच्चों को जमीन पर बैठने भी नहीं देते। ‘बेड’ पर ही उन्हें खिलौने दे दिए जाते हैं और परिकल्पना की जातीे है कि उनका बच्चा शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहे, माटीपुत्र बने, पर माटी से खेले बिना माटीपुत्र बनने की बात समझ से परे लगती है। 
आज का युग ज्ञान-विज्ञान का युग है। माता-पिता चाहते हंै कि उनका बच्चा वैज्ञानिक बने, डाॅक्टर, इंजीनियर बने, अच्छा आदमी भले ही न बन पाए। इसीलिए वे उन्हें होश सँभालते ही कम्प्यूटर थमा देते हैं। बच्चे खिलौने के बजाय कंयूटर से दोस्ती कर लेते हैं। कंयूटर के धूम-धडाक वीडियो गेम ही उनका प्रिय खेल हो जाता है। इसके अतिरिक्त मोबाइल बंदूक, तोप, रोबोट आदि आधुनिक खिलौने उनकी खेल- सामग्री होती हैं। बंदूक से खेलकर महामानव बनने की परिकल्पना कैसी?
 बच्चा आस-पास के परिवेष और समाज से परिचित भी नहीं हो पाता और उसकी नई जिंदगी की शुरुआत हो जाती है। जैसे-तैसे बच्चा ढाई-तीन साल का होता है, तो माता-पिता को उसकी शिक्षा की चिंता होने लगती है। महँगे-से-महँगे स्कूल या बोर्डिंग में उसे भर्ती करा दिया जाता है और यहीं से उसका बचपन छिनने लगता है। पढ़ाई और केवल पढ़ाई के चक्कर में बच्चा, बच्चा नहीं रह पाता, वह कोल्हू का बैल हो जाता है। स्कूल और घर दोनों ही जगह उससे केवल पढ़ने की बात होती है। होमवर्क के बोझ तले वह दब जाता है। पढ़ाई के चक्कर में माता-पिता और स्कूल बच्चों को जीवन की शिक्षा देना ही भूल जाते हैं। शायद इसीलिए बच्चे आगे चलकर जीवन को सही प्रकार से नहीं जी पाते। वे भौतिक उपलब्धियाँ भले ही हासिल कर लेते हों किंतु मानवीय संवेदनाओं से दूर चले जाते हैं।  
वर्तमान में किशोरों में अवसाद और तनाव बढ़ता जा रहा है, इसका कारण उनके बचपन का छिन जाना ही है। बच्चे के जन्म से ही माता-पिता की बड़ी-बड़ी अपेक्षाएँ होती हैं, जो उनके भीतर कुंठा पैदा करती हंै। जब वे माता-पिता की अपेक्षाओं में खरे नहीं उतरते तब वे हीन-भावना से ग्रस्त हो जाते हैं। परिणामस्वरूप बच्चे गलत राह की ओर अभिमुख हो जाते हैं। वे असंवेदनशील हो जाते हैं। यही नहीं किशोरों में दिनोंदिन आत्महत्या करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, जो वर्तमान समाज के लिए बहुत बड़ी चिंता का विषय है। इसलिए वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए समाज को अपनी सोच में बदलाव की जरूरत है।  
यह सच है कि आज समाज के सभी मानक बदले हैं। मानवीय आवश्यकताएँ बदली हैं। इसी कारण आज के मानव के चिंतन में भी बदलाव आया है। वह अर्थोपार्जन की मषीन बनता चला जा रहा है। इस प्रक्रिया में उनकी संवेदनाओं की नदियाँ सूखती जा रही हैं और हिंसक प्रवृत्तियाँ प्रबल होती जा रही हंै। बाल-साहित्य समीक्षक लक्ष्मीनारायण रंगा लिखते हैं-‘‘उपभोगतावादी विचारधारा ने हमें परार्थ से स्वार्थ की ओर दृष्टि दी है और हम प्रेम, करुणा, दया ममता, भाईचारा, स्नेह, शांति, सहयोग सब कुछ भूलकर सोने की आँखंे और प्लेटेनियम के दिल का टान्सप्लांटेशन करा रहे हैं और मानवता मर रही है।’’ 
ऐसे संक्रमणकाल में पल रहे बचपन को खोने से कैसे बचाएँ, इस पर आज विचार करने की आवश्यकता है। चिंतन की प्रक्रियाओं में बदलाव की जरूरत है।  बचपन को बचाने के लिए मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास करने की जरूरत है। आशावादी दृष्टिकोण को नए संदर्भ देने की जरूरत है। एक पुल बनाने की आवश्यकता है जिससे वर्तमान की आवश्यकताएँ, भविष्य की चिंताएँ और बचपन को बचाने के लिए एक राह बनाई जा सके। तेजी से बदलते सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेष को वर्तमान पीढ़ी के माध्यम से संरक्षित किया जा सके। डाॅ सुमन बिस्सा कहती हैं-‘‘बालक एक विकासमान चेतन अंश है, उसकी अपनी स्वतंत्र संभावनाएँ हैं, जिसे वह प्रमाणित करना चाहता है। फिर क्यों न उस चेतनशील प्राणी को वही बनने दिया जाए जो वह बनना चाहता है।’’ 


मौलिक

बलदाऊ राम साहू
सहायक संचालक
आदिम जाति अनुसूचित जाति विकास ,नया रायपुर छत्तीसगढ़                                                                     ई मेल -brscert@yahoo.in
मो. 09407650458

Friday, 13 March 2015

आने वाले कल में जब हिसाब आएगा,
यह दुनिया कैसी थी, क्या जवाब आएगा?

बंदुकों की नोक पर रौब जमाने वालों,
तुम्हारे हाथों कौन-सा खिताब आएगा।

इस तरह  जिन्दगी को डर कर क्यों जीते हो ,
कल सुबह सूरज के साथ इंकलाब आएगा।

कल जिस जमी को खून से सींचा गया था ,
उस जमी पर आज गुलिस्ता शबाब आएगा।

इतिहास के पन्नों पर लिखा जाता है कल,
तुम्हारे काम पर भी एक किताब आएगा।

Friday, 16 January 2015

सुख के गीत ल गावन दे


जब निकारे लोक परभाती, गीत नवा ल गावन दे।
बिमत ल सियार मा छोड़, सुमत के गाँठ बँधावन दे।

दुख-पीरा के नइ स्ंागवारी, सुख के सबो मितान हे।
दुख ल आँखी म पी के, सुख के गीत ल गावन दे।

अपन मरे म सरग दिखथे, हाना कहिथे सुजान मन।
अपने हाथ मा गोड़ ल सार के, पीरा ल भुलावन दे।

बेंदरा बिनास तब हो जाथेे, जब घर मा बिपत आथे।
आगी झन सपचाओं कोनो, पलपला ल जुड़ावन दे।

बिहनिया सूरुज के आवत, घपटे अंधियारी भगा जाथे।
हमुमन कुछू उजियार करन, एकठन दीया जलावन दे।

अपने जाँध उघार के कोन, का अपन मान बचाये हे?
कुटिल कपटी ये दुनिया हे, ‘बरस’ सबला बतावन दे।





















मनखे मन तो हिम्मत हार बइठे हे।


कोनो काम झन करव सरकार बइठे हे।
मुफत जिनिस मिलही, बजार बइठे हे।

जउन बोंथे उही हर काटथे फसल।
फोकट पाये बर सब तियार बइठे हे।

जउन खोजथे उही हर पाथे मोती।
अलाल मन सबो नदी पार बइठे हे।

कुकरा के बासे ले नइ निकले सुरुज।
धोखा म मनखे सब बेकार बइठे हे।

गांव-गांव मा खुले हे कलारी गजब।
संग देवईया उहाँ दू-चार बइठे हे।

कोनो बखत आ सकत हे मउत वो तुंहर।
मुहाट मा तो तोर दगादार बइठे हे।

कोनो ल तो झन समझा तैं ‘बरस’।
मनखे मन तो हिम्मत हार बइठे हे।






हर रोज जलालत सहती नारी,
कभी न वो कुछ कहती नारी।

घूँघट के बीच अपनी पीड़ा को,
अनकहे ही सब कहती नारी।

इतिहास ने बना दिया बे-जुबाँ,
‘अथ’ मौन अभी भी रहती नारी।

लगा दो ज़ख़्मों पर वो मरहम,
अनजाने क्या-क्या सहती नारी।

खुली नज़रों से देखो उन्हें,
नदियों-सी ही बहती नारी।

दे दो उन्हें कहने की आजादी,
गीता वो कुरान कहती नारी।