Sunday, 4 June 2017

काबर गजब इतरावत हस, चुरी ल अपन खनकावत हस. सुन लेतेस हमरो थोरिक अपने ला तैं सुनावत हस. लागथे हमला बात-बात मा तैं हर गजब अरझावत हस. आभा मार के तैं ह गोई पानी म आगी लगावत हस. तरिया जस हे भरे जवानी जीव ला कबार जरावत हस. 'बरस' कहत हे बात बने हे ठेगा काबर देखावत हस. बलदाऊ राम साहू 9407650458

धूप और खछाँव-सी जिंदगी

 कौवों की काँव-सी जिंदगी,
 फटे हुए पाँव - सी जिंदगी.

 खुशियों की मेघ कैसे लाएँ,
धूप और छाँव-सी   जिंदगी.

अंतस के भाव कहीं खो गए,
है 'सियासी दाँव-सी  जिंदगी.

रिश्तों में अब कहाँ मिठास है,
 उजड़े हुए गाँव-सी   जिंदगी.

 हाथों से छिनता पतवार अब
 लड़खड़ाती  नाव-सी जिंदगी.

 बलदाऊ राम साहू
 9407650458