Thursday, 28 May 2015

यह कैसी लाचारी


सत्ता के इस मोह जाल में
धृतराष्ट्र फँस जाते
राजनीति के स्वार्थ-पंक में
यूँ ही वे धँस जाते
निज आँखों पर पट्टी बाँधी
सहती सब गांधारी।

दुर्योधन और दुःशासन जब
यूँ मद में हैं होते
पल-पल अपने जीवन में
वे गरल-बीज हैं बोते
क्या यह कुत्सित इच्छाएँं हैं
या मन की बीमारी?

कृपाचार्य गुरुद्रोण बली
जब चक्रव्यूह रचते हैं
समय बीत जाने पर वे भी
सिर्फ हाथ मलते हैं
हर युग में गुरु, आचार्यों की
यह कैसी लाचारी?

अपने ही संकल्पों से जब
भीष्म पराजित होते
अपनी ही भूलों के प्रतिफल
बारबार वे रोते
कभी-कभी अपना ही प्रण भी
स्व पर होता भारी।

यह कैसी लाचारी?

Thursday, 7 May 2015




 बेटियाँ


नए-नए सपने अब सजाती हैं बेटियाँ,
राग नए गीत गुनगुनाती हैं बेटियाँ।

घरों में फुदकती हंै चिडि़यों की तरह,
आसमान तक पर फैलाती हैं बेटियाँ।

सुबह के सूरज की तरह आती हैं ,
मन का उजास बन जाती हैं बेटियाँ।

बाँध नहीं सकती बेडि़याँ पाँव उनके,
खुषियाँ बनकर गुदगुदाती हैं बेटियाँ।

सिखाईं थीं उन्हें हर वक्त पाबंदियाँ,
हर रोज नए पाठ पढ़ाती हंै बेटियाँ।

बेटियों का सुख चारदीवारी में नहीं
सीमाओं पर बंदूक चलाती हैं बेटियाँ।

कलंकनी हो नहीं सकतीं कभी भी वे,
दो कुलों का मान बढ़ाती हैं बेटियाँ।