Friday, 14 October 2016

नवगीत

जिसे देखिए वही राह में
काँटे बोते हैं

भाई का भाई से अनबन
भौजाई तो हुई पराई
और पड़ोसी सब लगते हैं
पूरे  निर्दयी कसाई
दुनिया की ये रीत देखकर
हम तो रोते हैं

पैसों से ही तौले जाते हैं
रिश्तों की गहराई
मान, प्रतिष्ठा और पद की
होती है खूब बड़ाई
कुंठाओं की विष-बेलें
खुद ही बोते हैं.

संबंधों के बीचोंबीच अब
स्वार्थ पनपते हैं
अपने ही  सब सगे-संबंधी
बैरी लगते हैं
अनचाहे संबंधों का ही
बोझ सदा  ढोते हैं

-बलदाऊ राम साहू
 मो 9407650458

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