यह कैसी सरकार रे भाई
यह कैसी सरकार रे भाई,
लूलों को पतवार रे भाई.
जिन हाथों में सत्ता दे दी,
लुच्चा वही लबार रे भाई.
माझी ने पतवार छोड़ दी,
डूबी नाव मझधार रे भाई.
जिन कंधों पर हल था कल तक,
उन हाथों तलवार रे भाई.
खुद की बंदूक सीना खुद का,
कैसी करूण पुकार रे भाई.
अब तक मन में आस बंधी थी,
जीत कहाँ सब हार रे भाई.
टूट गए हैं सब नाते-रिश्ते,
हर आँगन दीवार रे भाई.
@बलदाऊ राम साहू
No comments:
Post a Comment