अब पलाश में अंगार कहाँ,
फागुनाई अब बयार कहाँ.
बुझे-बुझे लगते हैं चेहरे,
मुस्काता अब संसार कहाँ.
हो गए जब अपने पराये,
हँसी-ठिठोली वो प्यार कहाँ,
रंगहीन हो गई है होली,
उल्लास भरा त्योहार कहाँ.
नहीं यहाँ अब कृष्ण-कन्हाई,
गोपियों का निच्छल प्यार कहाँ.
'बरस' बता दो जीयें कैसे,
जीवन का वो उपहार कहाँ.
@बलदाऊ राम साहू
फागुनाई अब बयार कहाँ.
बुझे-बुझे लगते हैं चेहरे,
मुस्काता अब संसार कहाँ.
हो गए जब अपने पराये,
हँसी-ठिठोली वो प्यार कहाँ,
रंगहीन हो गई है होली,
उल्लास भरा त्योहार कहाँ.
नहीं यहाँ अब कृष्ण-कन्हाई,
गोपियों का निच्छल प्यार कहाँ.
'बरस' बता दो जीयें कैसे,
जीवन का वो उपहार कहाँ.
@बलदाऊ राम साहू
No comments:
Post a Comment