Saturday, 31 March 2018

मोर संग मिले के बहाना बना ले

मोर  संग   मिलके  बहाना  बना ले,
नइ हे नवा  तब  तैं  पुराना  बना ले.

तोर मन ले मोर  मन मिल जही संगी,
आभा मारे बर तैं  कोनो गाना बना ले.

सोझ-सोझ कहे मा सरम घलो आथे,
पहिदा  कहे   बर  तै   हाना  बना  ले.

जिये-मरे  के  देखे  रहेन  सपना  हम,
 तैं  ह   मोला अपन  दीवाना  बना  ले.

लुका-लुका के  हम कब तक मिलबोन,
परगट मिले बर तैं  हर  ठिकाना बना ले.

तन-मन  मोरो चिटिक जुड़ा जाही संगी,
मोर भुजा ल  तैं  हर  सिरहाना  बना  ले. 

@बलदाऊ राम साहू

झन सँहराहू छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल

छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल

फूल समझ  के  झन  सँहराहू  धथुरा हे,
टमड़ के देख लौ दिल, ओकर पखरा हे।

सोच समझ के देहू  तुमन बिचार अपन
कौनो करिया, धँवरा  कौनो  कबरा  हे।

पीट-पीट  के  छाती जउन गोठियात हे,
झन समझहूँ दुखिया, ओमन  बपुरा हे।

बात-बात मा आँसू जउन बोहात  हावै,
सच कहत हौं नइ हे सिधवा, चतुरा हे।

कसम देस के खावत हे जउन मनखे मन
‘बरस’ कहत हे पक्का ओमन  लबरा  है।

झन सँहराहू= प्रसंशा मत करना, धथुरा=धतूरा , धँवरा=धवल, बपुरा = चालक, सिधवा= सीधा
बलदाऊ राम साहू 

Friday, 30 March 2018

धरती ले मया नँदागे

धरती  ले  मया  नँदागे,  काबर  कहिथस।
घर-घर म बइरासु आ गे, काबर कहिथस।

छत्तीसगढ़  म  गुरुतुर - गुरुतुर  भाखा  हे,
भाखा-बोली हमर परागे, काबर कहिथस।

कभु  नइ  टूटय  मया-पिरित  के  डोर इहाँ,
नाता-रिस्ता सब छरियागे, काबर कहिथस।

सब  के  घर  म  देवारी  के  दीया  बरत  हे,
अँधियारी ह भीतरी आ गे, काबर कहिथस।

'बरस' सबो  दिन  एक  बरोबर नइ होय जी,
जम्मो हमरे  भाग  नठागे, काबर  कहिथस।

बलदाऊ राम साहू

Monday, 26 March 2018

पहली सहीं सियान नँदागे

छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल 

पहली सहीं सियान नँदागे 

अब तो संगी गियाना नँदागे। 
पहलीसहीं  सहीं  सियान  नँदागे। 

काकर मानी ल  हम  पियन,
बिस्वास हमर,मितान नँदागे।
 
कौन  इहाँ  जाँगर  टोरत  हे ,
मिहनतकस किसान  नँदागे। 

लबरा मन सब  नेता  बनगे, 
सब करगा  हें, धान  नँदागे। 

मिथिया हे सब कहना इहाँ,
मनखे के सुभिमान  नँदागे। 

बलदाऊ राम साहू 

सियान= बुजुर्ग/मुखिया, काकर मानी ल हम पियन = किस पर विश्वास करें, सहीं=की तरह, करगा = धान का प्रतिरूप पर धान नहीं,मिथिया=मिथ्या।

Saturday, 24 March 2018

सुरुज नवा उगईया हे (छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल)

छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल ऊपर-ऊपर सँवारथस काबर, फोकट सेखी बघारथस काबर। ढ़ाई आखर परेम के होथे, तैं हर ओला नकारथस काबर। काल के मुंह म जाना हे सब ला, छीपे रहस उघारथस काबर। मनखे हरअस तब मनखे कस रह, अपने इज्जत उतारथस काबर। ‘बरस’ कहत हे अनमोल समय हे, समय ला अपन गँवाथस काबर। बलदाऊ राम साहू काबर= क्यों, फोकट=व्यर्थ, सेखी बघारथस= आत्म प्रसंशा, रहस=रहस्य, उघारथस= खोलते हो। हरअस = हो तो
हिंदी ग़ज़ल इंसानों के मन में कितनी उलझन है। कठिन राह पर चलना ही तो जीवन है। सुख औ’ दुख तो यूँ ही आते-जाते हैं। घर-आँगन ही सबका नंदन-कानन है। फूल खिले थे नन्हे-नन्हे, क्यारी में आज वहीं भाई-भाई में अनबन है। आसमान में उड़ने की आजादी है पर अपनों से प्यार जताना, बंधन है। जाति-धर्म के बीच दूरियाँ है लेकिन इस दूरी को और बढ़ाना, लघुपन है। कैसे हासिल राह अमन की सोचें अब झाँकें अपने भीतर, जो मन दरपन है। बलदाऊ राम साहू

Sunday, 18 March 2018

बाल गीत आओ मिलकर बात करें आओ मिलकर बात करें हम होली में। रंगों की बरसात करें हम होली में। धोएँ मन का मैल,हास -परिहास करें, बिन मतलब दूसरों का न उपहास करें। ज़ज्बातों का मान करें हम होली में। आओ मिलकर बात करें हम होली में। जुम्मन अलगू गले मिलें औ' प्यार करें, आपस में ना झगड़े, ना तक़रार करें। सद्भाव की लिखें इबादत हम होली में, आओ मिलकर बात करें हम होली में। अलग -अलग हों फूल, गंध अलग हों, चाहे गीत ,लय और सब छंद अलग हों। भावों का बस, मिलाप करें हम होली में, आओ मिलकर बात करें हम होली में। @बलदाऊ राम साहू 9407650458
छत्तीसगढ़ी बाल गीत होली खेलो - कूदो, नाचो - गाओ होरी मा। मस्ती के सब रंग लगाओ होरी मा। जिनगी मा कतको दुख-पीरा आथे जी उन सब ला झट तुम बिसराओ होरी मा। कब तक धरे रहिहु तुम जुन्ना बात इहाँ, नवा - नवा बिचार जगाओ होरी मा। जात-धरम के झगरा-झंझट ला छोड़व, बने पियार ले गला लगाओ होरी मा। दुखिया मन के मन मा उछाह छा जाही ऊँकरो दुख ला होरी बारौ होरी मा। बलदाऊ राम साहू
छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल घर-आँगन मा दिया बरे, तब मतलब हे। अँधियारी के मुँहू टरे, तब मतलब हे।। मिहनत के रोटी हर होथे भाग बरोबर, जम्मो मनखे धीरज धरे, तब मतलब हे। दुनिया कहिथे ओ राजा बड़ सुग्घर हे, दुखिया मन के दुख हरे, तब मतलब हे। नेत-नियाव के बात जानबे तब तो बनही अतलंग मन के बुध जरे, तब मतलब हे। सबके मन मा हावै दुविधा ‘बरस’ सुन ले, सब के मन ले फूल झरे, तब मतलब हे। बड़=बहुत;नेत-नियाव =नीति, अतलंग=उपद्रवी, बुध=बुद्धि। , बलदाऊ राम साहू
आफ़ताब की क्यों शिकायत करें, मिलजुल कर हम सब इबादत करें. ये चाँद, तारें, जमीं है यहाँ पर, इन्हीं से सभी आज उल्फ़त करें. वतन के हैं दुश्मन उन्हें कहें क्या वतन की मगर हम हिफ़ाजत करें. दहशत के साये में कब तक जियें , सरों को कटाने की हिम्मत करें. गगन में परिंदे उड़ें जिस तरह, बेडि़याँ तोड़कर अब बगावत करें. यहाँ लोग हैं सिर्फ मौका-परस्त , भला कैसे इनसे मुहब्बत करें. स्वयं ही बनाएँ चलो नए रास्ते ईमाँ की राहों में बरकत करें. सयाने खफा़ हैं भला क्यूँ 'बरस’ लौटा है बचपन शरारत करें. @बलदाऊ राम साहू

छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल




 घर-आँगन मा दिया बरे, तब मतलब हे।
 अँधियारी के मुँहू टरे, तब मतलब हे।।

 मिहनत के रोटी हर होथे भाग बरोबर,
जम्मो मनखे धीरज धरे, तब मतलब हे।

 दुनिया कहिथे ओ राजा बड़ सुग्घर हे,
 दुखिया मन के दुख हरे, तब मतलब हे।

 नेत-नियाव के बात जानबे तब तो बनही
 अतलंग मन के बुध जरे, तब मतलब हे।

 सबके मन मा हावै दुविधा ‘बरस’ सुन ले,
सब के मन ले फूल झरे, तब मतलब हे।

बलदाऊ राम साहू

 बड़=बहुत;नेत-नियाव =नीति, अतलंग=उपद्रवी, बुध=बुद्धि। , बलदाऊ राम साहू

Saturday, 17 March 2018

छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल एक बेर मदिरालय मा, आ जातेस उप्पर वाले। दरुहा मन ल बइठ के तैं समझातेस उप्पर वाले। जिनगी के बिस्वास गँवागे ऊँकर मन म लागत हे, मिल-बइठ के अंतस मा,भाव जगातेस उप्पर वाले। हरहिंसा जिनगी जीये के भाव कहाँ समझथे ओमन, सुख-दुख संग जीये के तैं आस बँधातेस उप्पर वाले। तँही हर डोंगहार अउ डोगा के चतवार तँही हस, बुड़त मनखे ला तैं हर, पार लगातेस उप्पर वाले। दरुहा =शराबी, गँवागे =गुम गया, हरहिंसा =निश्चिंत; चतवार=पतवार, हस= हो, डोंगहार =नावीक, डोंगा= नाव, बुड़त =डूबते हुए। बलदाऊ राम साहू