ग़ज़ल
आदमी को असहाय बनाती है गरीबी
आदमी को असहाय बनाती है गरीबी,
मौत का अहसास भी कराती है गरीबी.
सो रहा है चूल्हा भी हाँडी उपास है
राह ये पतन की दिखाती है गरीबी.
दिन भर संघर्ष की जो गाथा बहुत लिखी
रात में दर्द को दुहराती है गरीबी.
मान और अपमान में अब फर्क कहाँ रहा,
खून का घूँट हमें पिलाती है गरीबी.
जीतने का जज़्बा हममें बहुत है लेकिन,
जीत में भी हार को दिखाती है गरीबी.
पाप और पुण्य की उलझनें हैं बहुत,
इंसाँ को शर्मसार कर जाती है गरीबी
डूबने के डर से क्यूँ बैठा है तू ’बरस’
आदमी को इंसान बनाती है गरीबी.
@बलदाऊ राम साहू
मो 9407650458
आदमी को असहाय बनाती है गरीबी
आदमी को असहाय बनाती है गरीबी,
मौत का अहसास भी कराती है गरीबी.
सो रहा है चूल्हा भी हाँडी उपास है
राह ये पतन की दिखाती है गरीबी.
दिन भर संघर्ष की जो गाथा बहुत लिखी
रात में दर्द को दुहराती है गरीबी.
मान और अपमान में अब फर्क कहाँ रहा,
खून का घूँट हमें पिलाती है गरीबी.
जीतने का जज़्बा हममें बहुत है लेकिन,
जीत में भी हार को दिखाती है गरीबी.
पाप और पुण्य की उलझनें हैं बहुत,
इंसाँ को शर्मसार कर जाती है गरीबी
डूबने के डर से क्यूँ बैठा है तू ’बरस’
आदमी को इंसान बनाती है गरीबी.
@बलदाऊ राम साहू
मो 9407650458
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