Monday, 3 October 2016

ग़ज़ल
आदमी को असहाय बनाती है गरीबी

आदमी को  असहाय  बनाती  है  गरीबी,
मौत का अहसास भी  कराती  है  गरीबी.

सो  रहा  है  चूल्हा  भी  हाँडी  उपास  है
राह  ये  पतन   की   दिखाती  है  गरीबी.

दिन भर संघर्ष की जो गाथा बहुत लिखी
रात   में   दर्द   को   दुहराती   है   गरीबी.

मान और अपमान में अब फर्क कहाँ रहा,
खून  का   घूँट  हमें   पिलाती   है   गरीबी.

जीतने का जज़्बा हममें  बहुत है  लेकिन,
जीत  में भी  हार  को  दिखाती  है गरीबी.

पाप  और  पुण्य  की  उलझनें  हैं  बहुत,
इंसाँ  को  शर्मसार  कर  जाती है  गरीबी

डूबने  के डर  से क्यूँ  बैठा  है  तू  ’बरस’
आदमी  को   इंसान   बनाती  है  गरीबी.

@बलदाऊ राम साहू
 मो 9407650458

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