Wednesday, 16 March 2016

[13:40, 3/15/2016] B R Sahu:

आफ़ताब की क्यों शिकायत करें,
मिलजुल कर हम सब इबादत करें.

ये चाँद, तारें,  जमीं  है  यहाँ पर,
इन्हीं से सभी आज उल्फ़त  करें.

वतन के हैं दुश्मन उन्हें कहें क्या
वतन की मगर हम हिफ़ाजत करें.

दहशत के साये में कब तक जियें ,
सरों  को कटाने की  हिम्मत  करें.

गगन  में  परिंदे  उड़ें जिस  तरह,
बेडि़याँ तोड़कर अब बगावत करें.

यहाँ लोग हैं सिर्फ  मौका-परस्त ,
भला  कैसे  इनसे  मुहब्बत  करें.

स्वयं  ही  बनाएँ चलो  नए रास्ते
ईमाँ  की  राहों  में  बरकत  करें.

सयाने खफा़ हैं भला क्यूँ 'बरस’
लौटा  है   बचपन  शरारत  करें.

@बलदाऊ राम साहू
[12:07, 3/16/2016] B R Sahu:

आज मेरे गाँव में

अपने पराये हुए आज मेरे गाँव में.

उजड़ गए खेत सभी सूना खलिहान है
बूढे़ं सब  मुर्ख  हुए  छोकरे  सुजान  हैं
छाले तो दिखते नहीं अब किसी के पाँव में.
आज मेरे गाँव में.

ठहर गया पनघट़ घठौदें और घाट अब
खेमों में बँट रहे हैं तेली और जाट सब
उलझा-सा लगता है सब सियासी दाँव में.
आज मेरे गाँव में.

खेल और खिलौनों से सब रिश्ते टूट गए
लगता है बच्चों से घर-आँगन  रूठ गए
बचपन तो दिखता नहीं बरगद की छाँव में.
आज मेरे गाँव में.

आँगन में चिड़िया अब गीत नहीं गाती है
रधिया और बुधिया अब रीमेक सुनाती हैं
कोयल-स्वर मौन  है कौवों  की काँव  में.
आज मेरे गाँव में.

@बलदाऊ राम साहू

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