Wednesday, 26 August 2015

चलो साथ-साथ


मन के भीतर
दबी हुई हैं
कुत्सित इच्छाएँ
उन्हें मिटाएँ
नव पथ पर
चलो साथ-साथ
कदम बढ़ाएँ।

मन बोझिल है
तो दुश्चिंताएँ
बढ़ जाती हैं
अर्थहीन बातों से
शांति
कहीं खो जाती है
समर नहीं
शांति हेतु
शंख बजाएँ।

अर्जुन का मन
विचलित जब
हो जाता है
कुरुक्षेत्र में कृष्ण
उन्हें समझाता है
जब मर्यादाएँ
खंड-खंड हो जाएँ
बिन बूझे
धनुष उठाएँ।

मन के भीतर
स्वारथ के
बीज उग आते हैं
तभी गुरु द्रोण
चक्रव्यूह बनाते हैं
स्वारथ छोड़
परमारथ को
गले लगाएँ
सिद्धार्थ से
बुद्ध गौतम बन जाएँ
@बलदाऊ राम साहू

Tuesday, 11 August 2015

चलव गीत ल गा के देखन,



चलव गीत ल गा के देखन,
अंतस ल भुलिया के देखन।
सुख अउ दुख तो आथे-जाथे,
कभू हँसाथे कभू रोवाथे।
मन के पीरा मित बनथे जब
अपने अपन वो गोठियाथे।

ये सब के पाछू मा का हे ?
चिटिक हमू फरिया के देखन।

चार दिन बर चंदा आथे
फेर अँधियारी समा जाथे
ये जिनगी के घाम-छाँव
दुनिया भर ला भरमाथे।
जिनगी के मतलब जाने बर
दुख-पीरा टरिया के देखन।

जिनगी सरग बरोबर होथे
सुख हर जब सकला जाथे
मन उछाहित हो जाथे जब
बिछुरे कोनो अपन मिल जाथे
ये जिनगी के नार-फाँस ला
थोरिक हम धिरिया के देखन।

सावन-भादो म रुख-राई मन
पानी पा के हरिया जाथे
चिरई-चिरुगुन, फाँफा-मिरगा
हाँस-हाँस के गीत सुनाथे।
मुरझाये जिनगी ला संगी
चलव हमू हरिया के देखन।
@बलदाऊ राम साहू


बाल साहित्य से

बिन बरसे मत जाना बादल

करना नहीं बहाना बादल
बिन बरसे मत जाना बादल
सूख गई हैं धरती सारी
अब मत तू इतराना बादल।
मोर-पपीहा बाट देखते
उनको भी हर्षाना बादल
नन्हीं-नन्हीं बूदों के संगइंद्रधनुष दिखलाना बादल।

मत आना तुम चोरीे-छुपके
अतिथि बनकर आना बादल
भरकर खुशियाँ की झोली को
छम-छम बँूदें लाना बादल।
मेरा आँगन बहुत बड़ा है
यहीं ठहरने आना बादल
मैं खेलूँगी छप-छप-छप-छप
बिन बरसे मत जाना बादल।
@बलदाऊ राम साहू

मौन बस्तर की माटी

पंछी मौन हैं, लोग मौन हैं,
मौन बस्तर की माटी।
गौर श्रृंग से आभूषित थे
उल्लसित था मन
हँसमुख था उनका चेहरा
ताँबिया जैसा तन
गलबैहाँ डाले चलतीं थीं
बालाएँ मारे पाटी।
सन्नाटा-सा बना हुआ है
बीहड़ शाल वनों में
विकट उदासी कैसी मन में
भय का ज्वर जनों में
जंगल के सब पेड़ मौन है
पर्वत नदियाँ घाटी।
मातु-पितु से वंचित हुए
कितने नन्हे बच्चें
कितनों की आँख खुली थी
कितने अभी अधकच्चे
देशहित में काम जब आते
फूलती अपनी छाती।