हिंदी ग़ज़ल
हम जनता हैं, रंगदारों से क्या लेना,
सत्ता के हिस्सेदारों से क्या लेना.
जिनको सागर पार उतरना आता है,
मल्लाहों को पतवारों से क्या लेना.
हम तो आते-जाते हैं, हम राही हैं,
दुनिया को हम बंजारों से क्या लेना.
पेड़ घना है उस पर नन्हा-सा घर है,
बस दो दाने, बाजारों से क्या लेना.
नहीं खेलना आता है अंगारों से,
हमें तोप औ’ तलवारों से क्या लेना.
सरकारी है कोष लूट लो जितना चाहो,
तुमको इन मिहनतदारों से क्या लेना.
बलदाऊ राम साहू
हम जनता हैं, रंगदारों से क्या लेना,
सत्ता के हिस्सेदारों से क्या लेना.
जिनको सागर पार उतरना आता है,
मल्लाहों को पतवारों से क्या लेना.
हम तो आते-जाते हैं, हम राही हैं,
दुनिया को हम बंजारों से क्या लेना.
पेड़ घना है उस पर नन्हा-सा घर है,
बस दो दाने, बाजारों से क्या लेना.
नहीं खेलना आता है अंगारों से,
हमें तोप औ’ तलवारों से क्या लेना.
सरकारी है कोष लूट लो जितना चाहो,
तुमको इन मिहनतदारों से क्या लेना.
बलदाऊ राम साहू
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