Saturday, 19 March 2016

आफ़ताब की क्यों शिकायत करें,
मिलजुल कर हम सब इबादत करें.

ये चाँद, तारें,  जमीं  है  यहाँ पर,
इन्हीं से सभी आज उल्फ़त  करें.

वतन के हैं दुश्मन उन्हें कहें क्या
वतन की मगर हम हिफ़ाजत करें.

दहशत के साये में कब तक जियें ,
सरों  को कटाने की  हिम्मत  करें.

गगन  में  परिंदे  उड़ें जिस  तरह,
बेडि़याँ तोड़कर अब बगावत करें.

यहाँ लोग हैं सिर्फ  मौका-परस्त ,
भला  कैसे  इनसे  मुहब्बत  करें.

स्वयं  ही  बनाएँ चलो  नए रास्ते
ईमाँ  की  राहों  में  बरकत  करें.

सयाने खफा़ हैं भला क्यूँ 'बरस’
लौटा  है   बचपन  शरारत  करें.

@बलदाऊ राम साहू

Thursday, 17 March 2016

घुप  अँधियारी  छाये   हे,  उजियारी  कर,
एकहौवा नइ सकस तब, ओरी-पारी  कर.

बीर सिपाही मन सरहद म हँस-हँस के मरथें
देस   के  खातिर  तहूँ  हर, जंग  जारी  कर.

आज उही जिथे जग म जेकर भुजा ताकत हे
सुभिमान  संग जिये के,  जम के  तैयारी कर.

पग-पग म काँटा  बगरे  हे,  रद्दा  ल चतवार,
जिनगी ल जिये बर थोरिक तो हुसियारी  कर.

कोन अइसन बस्ती जिहाँ, नइ हे सुरुज-चाँद
देख अपन ल तैं हर,  दूसर के झन चारी  कर.

@बलदाऊ राम साहू
अब  पलाश में अंगार कहाँ,
फागुनाई  अब  बयार  कहाँ.

बुझे-बुझे   लगते  हैं  चेहरे,
मुस्काता अब  संसार  कहाँ.

हो  गए  जब  अपने  पराये,
हँसी-ठिठोली वो प्यार कहाँ,

रंगहीन   हो   गई   है  होली,
उल्लास  भरा  त्योहार  कहाँ.

नहीं यहाँ अब  कृष्ण-कन्हाई,
गोपियों का निच्छल प्यार कहाँ.

'बरस'   बता  दो   जीयें  कैसे,
जीवन  का  वो  उपहार  कहाँ.

@बलदाऊ राम साहू
बिपत  म हे  संसार, का करन,
लुटत हे  ये  बजार, का  करन.

नाता- रिस्ता  सुवारथ  के  हे,
मतलब के सब  यार, का  करन.

घर - दुवार  सब  खेत  बेंचागे,
इज्जत  तार  -तार, का  करन.

मुख हर दिखथे कुलकत हावय
अंतस  म  अँधियार, का  करन.

घर  के जोरु पर-बुधनिन  होगे
'बरस' खड़े मुँह फार, का करन,

@बलदाऊ राम साहू
आजादी के अतका  साल होगे,
जनता ह कतका खुसहाल होगे.

बाड़िस भूख अउ  जबर महंगाई
मनखे के अब हाल-बेहाल होगे.

अब तो लड़ना  अउर  लड़वाना
फकत  ये   सियासी  चाल  होगे.

जउन हे कुरसी  के  आगू-पाछू
जम्मो मन  अब  मालामाल होगे.

मनखे ला सुख-दुख पूछना अब
'बरस' सबले कठिन सवाल होगे.

@बलदाऊ राम साहू
जिनके  मन में सवाल  होते हैं,
बस वही तो खुशहाल  होते  हैं।

तिनका-तिनका जोड़ा है जिसने
जग में  वो  मालामाल  होते   है।

माँ  का  मान  बढ़ाया है  जिनने
वे  ही  गुदड़ी  के लाल  होते हैं ।

समय का मान जो  किया  नहीं
सच  में  वही   कंगाल  होते  हैं ।

जब  दुख  से  होता  है  सामना
क्षण, महीने  औ' साल  होते  हैं।

@बलदाऊ राम साहू

Wednesday, 16 March 2016

एक नव गीत

चेहरे रौशन हुए
पचपनवें साल में.

बिन बुलाए आ गई है
फागुनी बयार अब
खत्म हुई दूरियाँ
ढह गई दीवारें सब
बज रहे हैं ढोल अब
मन की चौपाल में.

ठहर गए हैं पाँव अब
निहारने पलाश को
बौराये आम तले
जगाने विश्वास को
सपने संजो रहे हैं
अनुत्तरित सवाल में.

अनजानी हवाएँ जब
मन को झकझोंरतीं
गीतों में छंद बन
भावों को हिलोरतीं
तन-मन डूब गया
यौवनी खयाल में.

@बलदाऊ राम साहू
क्यों  बैठे  हो मौन, बता दो  बापू  के  बंदर,
अपनी  मंशा हमें  जता  दो  बापू  के  बंदर।

बात-बात में लोग यहाँ पर आग लगा जाते हैं
उच्छृंखलता से मुक्ति दिला दो बापू के  बंदर।

बिना राजधर्म को  जाने  नारे  लगा  रहे  हैं,
इनके  भीतर भाव जगा  दो  बापू  के  बंदर।

ज्ञानी, ध्यानी, संत, महाजन अपने को बतलाते,
अज्ञानियों  को  राह  बता दो बापू के बंदर।

वतन  बेचने  को  तत्पर  हैं  ये सब मूढ़मति,
मातृभूमि  की  आन  बचा  दो  बापू के बंदर।

जात-धर्म  इनकी  रोटी  है, कुटिलता पुलाव,
भाईचारे का मरम  बता  दो  बापू  के  बंदर।

बेशर्मी की  हद  हो  गई अपनी हाँक  रहे हैं,
मर्यादा का  अर्थ लखा  दो  बापू  के  बंदर।

'बरस’ केवल चिंता करता है निष्ठुर हैं सब लोग
उनके  भीतर  जोत जला  दो  बापू  के बंदर।

@बलदाऊ राम साहू
रद्दा म एकझन पहिचान दिखिस,
पक्का  वोहर  बेईमान   दिखिस.

गोठियाईस  वोहर  मीठ -मीठ,
लबरा  मोला   मितान  दिखिस.

सुवारथ खातिर  ईमान बेचईया,
मनखे रूप म  शैतान  दिखिस.

हमर पीठ   म   छूरा  गोभईया,
मोला  वो  पाकिस्तान  दिखिस.

एके   दाई   के    पेट   उपजेन,
वो भाई कइसे अनजान दिखिस.

@बलदाऊ राम साहू
अपन  हाथ  तलवार  राख,
जमगरहा बने धारदार राख.

दुस्मन के संग लड़ना हे तब
एक एक  नहीं  हजार  राख.

कोनो बैरी झन सिर उठाये,
मन  म  ठोस  बिचार राख.

अपन उप्पर कर ले भरोसा,
दूसर  के झन आधार राख.

जिनगी म कतको बोदरा हे,
'बरस' तैं हर सार-सार राख.

राख=रखें,  जमगरहा=वजनदार/मजबूत,  झन=मत, म=में, बोदरा=अधपके अनाज के दाने(सारहीन तत्व)
@बलदाऊ राम साहू
9407650458
[13:40, 3/15/2016] B R Sahu:

आफ़ताब की क्यों शिकायत करें,
मिलजुल कर हम सब इबादत करें.

ये चाँद, तारें,  जमीं  है  यहाँ पर,
इन्हीं से सभी आज उल्फ़त  करें.

वतन के हैं दुश्मन उन्हें कहें क्या
वतन की मगर हम हिफ़ाजत करें.

दहशत के साये में कब तक जियें ,
सरों  को कटाने की  हिम्मत  करें.

गगन  में  परिंदे  उड़ें जिस  तरह,
बेडि़याँ तोड़कर अब बगावत करें.

यहाँ लोग हैं सिर्फ  मौका-परस्त ,
भला  कैसे  इनसे  मुहब्बत  करें.

स्वयं  ही  बनाएँ चलो  नए रास्ते
ईमाँ  की  राहों  में  बरकत  करें.

सयाने खफा़ हैं भला क्यूँ 'बरस’
लौटा  है   बचपन  शरारत  करें.

@बलदाऊ राम साहू
[12:07, 3/16/2016] B R Sahu:

आज मेरे गाँव में

अपने पराये हुए आज मेरे गाँव में.

उजड़ गए खेत सभी सूना खलिहान है
बूढे़ं सब  मुर्ख  हुए  छोकरे  सुजान  हैं
छाले तो दिखते नहीं अब किसी के पाँव में.
आज मेरे गाँव में.

ठहर गया पनघट़ घठौदें और घाट अब
खेमों में बँट रहे हैं तेली और जाट सब
उलझा-सा लगता है सब सियासी दाँव में.
आज मेरे गाँव में.

खेल और खिलौनों से सब रिश्ते टूट गए
लगता है बच्चों से घर-आँगन  रूठ गए
बचपन तो दिखता नहीं बरगद की छाँव में.
आज मेरे गाँव में.

आँगन में चिड़िया अब गीत नहीं गाती है
रधिया और बुधिया अब रीमेक सुनाती हैं
कोयल-स्वर मौन  है कौवों  की काँव  में.
आज मेरे गाँव में.

@बलदाऊ राम साहू