Wednesday, 18 April 2018

शिशु गीत

(1)


चिड़िया आई, चिड़िया आई,
गीत  सुनाने  चिड़िया  आई।

पंख    पसारे  आती  है वह,
दाना चुग-चुग खाती है वह।

कभी-कभी लालच में आकर,
फंदे में फँस  जाती   है  वह।

(2)

बड़े   रसीले   होते    आम
कुछ सस्ते, कुछ महँगे दाम।

चौसा और दशहरी, लँगड़ा
तरह-तरह के इनके   नाम।

एक  कहावत  सुनी  है  हमने,
आम के आम गुठलियों के दाम।

बलदाऊ राम साहू

छत्तीसगढ़ी गज़ल 


सुरता  के  डोरी  ला  लमाए  रख।
मन के बात ल मन मा छुपाए रख।

जिनगी मा सुख के गजब दिन देखेन,
सबे  ल नहीं,  आधा  ला  बचाए रख।

जखम कतको रहाय अपन दिल मा,
दिल के पीरा ल दिल मा दबाए रख।

मने-मन म कतका गुनत रहिथस तैं हर,
भीतर  मा  भाव  सुघर  जगाए  रख।

‘बरस’ ये दुनिया हरे चारेच  दिन  के
ओकर संग मा लव तैं  लगाए  रख।

बलदाऊ राम साहू

Thursday, 12 April 2018

छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल 

गोरी होवै या कारी  होवै। 
सारी तब्भो ले प्यारी होवै।

अलवा-जलवा राहय भले जी
एकठन हमर सवारी होवै।

करन बड़ाई  एक  दूसर  के 
काकरो कभू झन चारी होवै। 

राहय भले घर टुटहा-फुटहा
तब्भो ले ओ फुलवारी होवै।

बेटा कड़हा - कोचरा  राहय
मंदहा अउ झन जुवारी होवै।

'बरस' कहत हे  बात  जोख  के,
जिनगी म कभु झन उधारी होवै।

बलदाऊ राम साहू 

तब्भो = तो पर भी, अलवा-जलवा= समान्य, चारी= निंदा, कड़हा-कोचरा =अनुत्पादक, मंदहा =मद्यपान सेवन करने वाला,

Wednesday, 11 April 2018

नव गीत 


नव गीत 

कुछ पाने की आस में 

हम तो बैठे रहे किनारे 
कुछ पाने की आस में. 

कौन यहाँ पर शोर कर रहा 
कौन बजा रहा बीन 
किसका खो गया राजपाट 
कौन किसके आधीन 
किसको मिला राजसिंहासन 
कौन गया वनवास में 

किसने चौसर चाल बिछायी
किसने दाँव लगाया 
किसने बाजी मार ली है 
कौन यहाँ पछताया 
कौन है जो राह तक रहा 
दूसरों के विश्वास में. 

करम पच्चीसी लिखी हुई है 
सबके माथे में
जय-पराजय,  सुख-दुख सब
होते हैं खाते में 
कोई उत्सव मना रहा है 
कोई है आवास में.

बलदाऊ राम साहू

छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल 


उन मन तो मालामाल होवत हें।
जनता जम्मो कंगाल  होवत हें।

हमन तो  डार  बरोबर  पतझर  के,
फागुन कस ओमन लाल होवत हें।

ओमन हर तो जी फरत-फूलत हें,
हमरे  तो   बारह हाल  होवत  हें।

करिया-करिया तो हम मन दिखथन,
उन  मन  गोरी  के  गाल  होवत हें।

हम   तो  होगेन   छोटकन  उत्तर,
ओमन ह बड़का सवाल होवत हें।

बलदाऊ राम साहू
छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल

धरती ले सब मया नँदागे, का कहिबे।
घर-घर मा बइरासू आगे, का कहिबे।

दाई-ददा मन घीरलत हे, जिनगी भर,
लइका मन के चेत हरागे, का कहिबे।

अपन हाथ मा काम सिधही कहिथे जी
अब तो लोक के गियान परागे, का कहिबे।

मीत दिखथे सुवारथ के, ये दुनिया मा
अंतस के सब भाव सिरागे, का कहिबे।

बइरासू=बाहरी हवा/नकारात्मक विचार, नँदागे= विलुप्त, घीरलत हे= घसीट रहे हैं, परागे= खो गए, सिरागे=खत्म हो गए हैं,

बलदाऊ राम साहू

Saturday, 7 April 2018

अंतस मा उल्लास हावै

छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल

मन मा जब तक अहसास हावै जी।
अंतस मा  सब  उल्लास  हावै  जी।

कब तक खोजहु तुम बाहिर-बाहिर,
जम्मो    तुहरेंच   पास   हावै   जी।

सच हर  हाँसत-मुसकावत हे जब
काबर  मन  हर  उदास  हावै  जी।

 अंतर  मन  ले कल लेवौ  दरसन,
 लकठा कासी  कैलास  हावै  जी।

राम  बसे  हे  तोर मन म जब तक,
'बरस' के मन ह उजास  हावै  जी।

लकठा= निकट, तुहरेंच =तुम्हारे।

बलदाऊ राम साहू

Sunday, 1 April 2018

सुन मितान छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल

नेता  मन  सब चतुरा होगे, सुन मितान।
जनता मन सब बपुरा होगे, सुन मितान।

ये  जुग  मा  सब  उलटा-पुलटा  लागत हे,
टिमकी मन सब दफड़ा होगे, सुन मितान।

आनी-बानी, किसम-किसम गोठियावत हे,
चमचा मन सब  चपड़ा  होगे, सुन मितान।

बात  इहाँ  के उहाँ  लुहावत  रहिस ओमन,
बिन मतलब के लफड़ा होगे, सुन  मितान।

बलदाऊ राम साहू