पंछी तुम
दूर दूर तक विस्तारित है नील गगन,
पंछी। तुम पर फैला कर उड़ जाना
नहीं तुम्हें है डर किसी का अब रहा,
मुक्त कंठ से गीत खुशी के तुम गाना।
बाधाओं से मुक्त हो गई सब राहें,
अपनों से हैं लोग उन्हें तुम समझाना
बैशाखी की नहीं जरूरत है तुमको,
अनुपम और सुघर-सी प्रतिमा गढ़ जाना।
युगों-युगांे तक रहे सदा पिंजरे के पीछे,
शोषित, उपेक्षित रहे दलित पद के नीचे
आसमान को छू जाने का है साहस,
जग को तुम समर्थ भावों से भर जाना।
मन में रखना सदा इरादें फौलादी,
उदित सूर्य मंे कहीं ग्रहण न लग जाए
बिखर न जाएँ सूरज की चंचल किरणें,
सभी किरणों को इक मुठ्ठी में भर लाना।

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