Friday, 16 January 2015

हर रोज जलालत सहती नारी,
कभी न वो कुछ कहती नारी।

घूँघट के बीच अपनी पीड़ा को,
अनकहे ही सब कहती नारी।

इतिहास ने बना दिया बे-जुबाँ,
‘अथ’ मौन अभी भी रहती नारी।

लगा दो ज़ख़्मों पर वो मरहम,
अनजाने क्या-क्या सहती नारी।

खुली नज़रों से देखो उन्हें,
नदियों-सी ही बहती नारी।

दे दो उन्हें कहने की आजादी,
गीता वो कुरान कहती नारी।

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