बेटियाँ
नए-नए सपने अब सजाती हैं बेटियाँ,
राग नए गीत गुनगुनाती हैं बेटियाँ।
घरों में फुदकती हंै चिडि़यों की तरह,
आसमान तक पर फैलाती हैं बेटियाँ।
सुबह के सूरज की तरह आती हैं ,
मन का उजास बन जाती हैं बेटियाँ।
बाँध नहीं सकती बेडि़याँ पाँव उनके,
खुषियाँ बनकर गुदगुदाती हैं बेटियाँ।
सिखाईं थीं उन्हें हर वक्त पाबंदियाँ,
हर रोज नए पाठ पढ़ाती हंै बेटियाँ।
बेटियों का सुख चारदीवारी में नहीं
सीमाओं पर बंदूक चलाती हैं बेटियाँ।
कलंकनी हो नहीं सकतीं कभी भी वे,
दो कुलों का मान बढ़ाती हैं बेटियाँ।
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