Tuesday, 24 March 2015

दीपक जल जाने दो



उड़ने को आतुर है पंछी
उड़ जाने दो
मुक्त कंठ से गीत उन्हें
अब गाने दो

दुर्गम वन-कानन में ये
उड़ जाते हैं
निश्छल हो चंचलपन जब
दिखलाते हैं
अब तो भय की जंजीरों को
गल जाने दो

काल का पहिया यूँ ही
चलता जाता है
समय संग सूरज भी तो
ढल जाता है
अंधियारे से लड़ने दीपक
जल जाने दो

पर्वत हृदय का जल
नदिया बन जाता है
कलकल गंुजित स्वर में
छनकर आता है
अंतस की पीड़ा को आँसू
बन जाने दो

सावन की बूंदों से पौधे
उग आतेहैं
सहमी-सी पीढ़ी के वंशज
मुसकाते हैं
प्रातः नव कोमल किरणों को
आ जाने दो।
दीपक जल जाने दो


उड़ने को आतुर है पंछी
उड़ जाने दो
मुक्त कंठ से गीत उन्हें
अब गाने दो


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