manjri
Tuesday, 11 August 2015
बाल साहित्य से
बिन बरसे मत जाना बादल
करना नहीं बहाना बादल
बिन बरसे मत जाना बादल
सूख गई हैं धरती सारी
अब मत तू इतराना बादल।
मोर-पपीहा बाट देखते
उनको भी हर्षाना बादल
नन्हीं-नन्हीं बूदों के संगइंद्रधनुष दिखलाना बादल।
मत आना तुम चोरीे-छुपके
अतिथि बनकर आना बादल
भरकर खुशियाँ की झोली को
छम-छम बँूदें लाना बादल।
मेरा आँगन बहुत बड़ा है
यहीं ठहरने आना बादल
मैं खेलूँगी छप-छप-छप-छप
बिन बरसे मत जाना बादल।
@बलदाऊ राम साहू
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