यह कैसी लाचारी
सत्ता के इस मोह जाल में
धृतराष्ट्र फँस जाते
राजनीति के स्वार्थ-पंक में
यूँ ही वे धँस जाते
निज आँखों पर पट्टी बाँधी
सहती सब गांधारी।
दुर्योधन और दुःशासन जब
यूँ मद में हैं होते
पल-पल अपने जीवन में
वे गरल-बीज हैं बोते
क्या यह कुत्सित इच्छाएँं हैं
या मन की बीमारी?
कृपाचार्य गुरुद्रोण बली
जब चक्रव्यूह रचते हैं
समय बीत जाने पर वे भी
सिर्फ हाथ मलते हैं
हर युग में गुरु, आचार्यों की
यह कैसी लाचारी?
अपने ही संकल्पों से जब
भीष्म पराजित होते
अपनी ही भूलों के प्रतिफल
बारबार वे रोते
कभी-कभी अपना ही प्रण भी
स्व पर होता भारी।
यह कैसी लाचारी?
No comments:
Post a Comment