Wednesday, 26 August 2015

चलो साथ-साथ


मन के भीतर
दबी हुई हैं
कुत्सित इच्छाएँ
उन्हें मिटाएँ
नव पथ पर
चलो साथ-साथ
कदम बढ़ाएँ।

मन बोझिल है
तो दुश्चिंताएँ
बढ़ जाती हैं
अर्थहीन बातों से
शांति
कहीं खो जाती है
समर नहीं
शांति हेतु
शंख बजाएँ।

अर्जुन का मन
विचलित जब
हो जाता है
कुरुक्षेत्र में कृष्ण
उन्हें समझाता है
जब मर्यादाएँ
खंड-खंड हो जाएँ
बिन बूझे
धनुष उठाएँ।

मन के भीतर
स्वारथ के
बीज उग आते हैं
तभी गुरु द्रोण
चक्रव्यूह बनाते हैं
स्वारथ छोड़
परमारथ को
गले लगाएँ
सिद्धार्थ से
बुद्ध गौतम बन जाएँ
@बलदाऊ राम साहू

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