Thursday, 12 April 2018

छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल 

गोरी होवै या कारी  होवै। 
सारी तब्भो ले प्यारी होवै।

अलवा-जलवा राहय भले जी
एकठन हमर सवारी होवै।

करन बड़ाई  एक  दूसर  के 
काकरो कभू झन चारी होवै। 

राहय भले घर टुटहा-फुटहा
तब्भो ले ओ फुलवारी होवै।

बेटा कड़हा - कोचरा  राहय
मंदहा अउ झन जुवारी होवै।

'बरस' कहत हे  बात  जोख  के,
जिनगी म कभु झन उधारी होवै।

बलदाऊ राम साहू 

तब्भो = तो पर भी, अलवा-जलवा= समान्य, चारी= निंदा, कड़हा-कोचरा =अनुत्पादक, मंदहा =मद्यपान सेवन करने वाला,

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