छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल
गोरी होवै या कारी होवै।
सारी तब्भो ले प्यारी होवै।
अलवा-जलवा राहय भले जी
एकठन हमर सवारी होवै।
करन बड़ाई एक दूसर के
काकरो कभू झन चारी होवै।
राहय भले घर टुटहा-फुटहा
तब्भो ले ओ फुलवारी होवै।
बेटा कड़हा - कोचरा राहय
मंदहा अउ झन जुवारी होवै।
'बरस' कहत हे बात जोख के,
जिनगी म कभु झन उधारी होवै।
बलदाऊ राम साहू
तब्भो = तो पर भी, अलवा-जलवा= समान्य, चारी= निंदा, कड़हा-कोचरा =अनुत्पादक, मंदहा =मद्यपान सेवन करने वाला,
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