छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल
धरती ले सब मया नँदागे, का कहिबे।
घर-घर मा बइरासू आगे, का कहिबे।
दाई-ददा मन घीरलत हे, जिनगी भर,
लइका मन के चेत हरागे, का कहिबे।
अपन हाथ मा काम सिधही कहिथे जी
अब तो लोक के गियान परागे, का कहिबे।
मीत दिखथे सुवारथ के, ये दुनिया मा
अंतस के सब भाव सिरागे, का कहिबे।
बइरासू=बाहरी हवा/नकारात्मक विचार, नँदागे= विलुप्त, घीरलत हे= घसीट रहे हैं, परागे= खो गए, सिरागे=खत्म हो गए हैं,
बलदाऊ राम साहू
धरती ले सब मया नँदागे, का कहिबे।
घर-घर मा बइरासू आगे, का कहिबे।
दाई-ददा मन घीरलत हे, जिनगी भर,
लइका मन के चेत हरागे, का कहिबे।
अपन हाथ मा काम सिधही कहिथे जी
अब तो लोक के गियान परागे, का कहिबे।
मीत दिखथे सुवारथ के, ये दुनिया मा
अंतस के सब भाव सिरागे, का कहिबे।
बइरासू=बाहरी हवा/नकारात्मक विचार, नँदागे= विलुप्त, घीरलत हे= घसीट रहे हैं, परागे= खो गए, सिरागे=खत्म हो गए हैं,
बलदाऊ राम साहू
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