आज के बच्चे और बाल-साहित्य
आज का समाज बहुत बदला हुआ है। समाज बदला है, समाज की सोच बदली है। इस बदले हुए समाज में बच्चे और बच्चों की आकांक्षाएं बदलीं हैं, सुविधाएं बढ़ी हैं, संसाधन बदले हैं। इस बदलाव के युग में साहित्य और साहित्यिक दृष्टिकोण में भी बदलाव आया है, तो निश्चय ही बाल साहित्य में भी बदलाव आना स्वाभाविक है।
बाल-साहित्य कहने से मस्तिष्क में जो दृश्य उभरते हैं उनमें शामिल है -बच्चों की जिज्ञासा, चंचलता, कल्पना और उनका नटखटपन। बच्चे स्वभाव से सहज, सरल, निश्छल होते हैं और यही गुण बाल-साहित्य में समाहित होते हैं। बाल-साहित्य भाषायी संस्कार को विकसित करने का एक माध्यम भी है। बाल-साहित्य को अलग करके हम बच्चों की शिक्षा की परिकल्पना भी नहीं कर सकते । प्राथमिक से माध्यमिक शाला तक की पाठ्यवस्तु को बाल साहित्य से पृथक करके नहीं देख सकते । भाषा और साहित्य का सम्बन्ध अन्योन्याश्रित है। साहित्य के माध्यम से भाषायी विकास और भाषा के माध्यम से साहित्य की समझ, ये दो पहलू हमारे समक्ष होते हैं। बाल-साहित्य को भाषायी चेतना के रूप में भी देखा जाना चाहिए। बच्चे, बाल-साहित्य के माध्यम से भाषायी संरचना को क्रमशः समझते चलते हैं, यह ही नहीं, नई भाषा भी गढ़ते हैं। बच्चे सहज रूप में अपेक्षित ज्ञान प्राप्त करने के लिए उन्मुख होते हैं। बच्चों में भाषायी विकास के साथ चिंतन, परिकल्पना, जिज्ञासा को प्रबल करने में बाल-साहित्य मददगार भी होता है। यह केवल परिकल्पना और जिज्ञासा पैदा नहीं करता बल्कि समाधान भी देता है।
बच्चों के लिए लिखना आमतौर परकाया प्रवेश करना जैसा ही है। यह कहें कि बच्चा बनना है । बच्चा बनकर ही बाल साहित्य लिखा जा सकता है। और यह चुनौतीपूर्ण कार्य होता है। उसमें न केवल बालमनोविज्ञान को समझने जैसी चुनौती होती है बल्कि अपने से अधिक जिज्ञासु और ऊर्जावान मस्तिष्क की अपेक्षाओं पर खरा उतरना होता है। ऐसा वही साहित्यकार कर पाते हैं जिनमें नया सोचने और उसको रोचक ढंग से प्रस्तुत करने की क्षमता होती है। जो अपने पूर्वाग्रहों को पीछे छोड़कर सृजनात्मकता बनाए रखते हैं वे ही आज की आवश्यकता के अनुरूप मौलिक साहित्य रच पाते हैं। आधुनिक संदर्भों को जोड़कर रखना सृजनात्मक मेधा से संभव है। विज्ञान या समाज विज्ञान को समझ कर मौलिक अभिव्यक्ति वही दे सकता है जिन्होंने बालसाहित्य को जड़ता से मुक्त करने के लिए अपनी कलम चलाई है।
बच्चे समर्थ समाज का एक महत्वपूर्ण अंग हैं। हम बच्चों को अलग करके किसी भी समाज की परिकल्पना नहीं कर सकते। बच्चों में ही एक स्वस्थ और चेतना युक्त समाज प्रतिबिंबित होता है, इसलिए हम समाज में बच्चों की उपस्थिति को अस्वीकार भी नहीं कर सकते। इस दृष्टि से बच्चों के विकास के लिए मनोवैज्ञानिक और मनोरंजनात्मक बाल-साहित्य का होना आवश्यक है। बाल-साहित्य बच्चों का मित्र भी है और मार्गदर्शक भी, साथ ही जीवन मूल्यों को जानने और समझने का माध्यम भी।बच्चा बाल-साहित्य की कविता, कहानी, एकांकी, जीवनी या अन्य विधाओं के माध्यम से आए विचारों को अपने से जोड़कर देखता है और मनन करते हुए उनके गुण-दोषों का विश्लेषण करता है। हम यह भी कह सकते हैं कि इससे उनमें सत्य-असत्य का ज्ञान,अच्छे और बुरे में अंतर करना आदि आता है।
बहुत से विद्वान साथी बाल-साहित्य की उपादेयता पर प्रश्न चिह्न लगाते हैं। उनका कहना है, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के युग में जब बच्चों के हाथ में रिमोट है, मोबाइल और अन्य नवीन संसाधन हैं तब वह राजा-रानी की कहानियों, परीकथाओं, जंगली पशु-पक्षियों से संबंधित सामग्री में अपना ध्यान क्यों लगाएँगे। यहां हमें यह जानने और समझने की आवश्यकता है कि इंटरनेट और मोबाइल के युग में बचपन खोता जा रहा है और चिंताएँ बढ़ती जा रही हैं । एकल परिवार में बच्चा अकेला हो गया है। कामकाजी माता-पिता और बच्चों के बीच में संवादहीनता पनप रही है। बच्चे अपने अकेलेपन से जूझ रहे हैं या एकाकीपन को दूर करने के लिए टी . वी. मोबाइल और वीडियो गेम का सहारा ले रहे हैं,आत्मघाती हो रहे हैं। संवेदनाओं का स्थान अब क्रूरता लेती जा रही है। इन परिस्थितियों में आज बाल साहित्य और बाल साहित्यकार का दायित्व बहुत अधिक बढ़ जाता है। आज यह एक बड़ी चुनौती है कि बच्चों में मानवीय मूल्यों को रोपण कैसे करें? बच्चों को किस तरह दिशा प्रदान करें?
वर्तमान परिवेश में सूचनाओं का विस्फोट हो रहा है। यत्र-तत्र जानकारियाँ बिखरी हुई हैं। बच्चे एक क्लिक करके समाधान पाने की कोशिशि करते हैं । आज के बच्चों में कल के बच्चों की तुलना में जानकारियों तक पहुंच अत्याधिक है। किन्तु ये सारी जानकारियाँ ज्ञान नहीं हैं।
इन जानकारियों से समझ विकसित नहीं हो पा रही है। समझ विकसित करने के लिए बच्चों को सकारात्मक चिंतन की ओर ले जाने की आवश्यकता है और यही कार्य बाल-साहित्य का है।
आज के बच्चों की जिज्ञासाएँ असीमित हैं , अपेक्षाएं बढ़ीं हैं, उनमें परिकल्पनाओं के नवीन पंख उग आये हैं, उनकी उनकी इन आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु बाल साहित्यकारों को ही आगे आना होगा। वैसे बाल-साहित्य न कभी मौन रहा है और न रहेगा। बाल-साहित्यकारों को बाल-मनोविज्ञान को समक्ष रखकर बच्चों की आवश्यकताओं और जिज्ञासाओं के अनुरूप बाल-साहित्य रचने की आवश्यकता है। यदि हम यह कहते हैं कि सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में बच्चे को आज की आवश्यकता के अनुरूप सामग्री चाहिए, तो बाल-साहित्यकार को भी विज्ञान से जुड़ी हुई, वर्तमान समय की मांग के अनुसार कथा कहानी, कविता या अन्य सामग्री उपलब्ध कराने के आवश्यकता है। आज के बच्चे वैश्विक बाजारवाद के चपेट में आते जा रहे हैं। वे टी.वी . में प्रचारित लोक-लुभावन विज्ञापन को देखते हैं और उसी के अनुरूप सपने पालते हैं। यह समझने की आवश्यकता है कि बाल-साहित्य की कौन-सी विधा है, जो उनके सपनों के आसपास की है। इसके लिए वर्तमान में उपलब्ध बाल-साहित्य का विश्लेषण करने की आवश्यकता है और विश्लेषण के पश्चात् जो रिक्तता है, उसे भरने की भी, ताकि आज के जिज्ञासु बच्चे अपनी अपेक्षा के अनुरूप सामग्री का चयन कर सकें।
मैं अंत में एक बात और कहना चाहूँगा जब हम यह कहते है कि बच्चा अब बच्चा नहीं रह गया है, वह ज्ञान के क्षेत्र में प्रौढ़ है तो आज के ऐसे समर्थ बच्चे को हम क्या दें। हमें समाज की मनोदशा को समझना पड़ेगा। क्या वर्तमान समाज बच्चों को बच्चे रहने देना चाहता है? क्या वह उनमें मानवीय मूल्यों को स्थापित करना चाहता है? क्या वह बच्चों को अपने मन का कुछ करने की आजादी देना चाहता है? आज बच्चा पैदा हुआ नहीं कि उस पर जिस तरह पढ़ाई का बोझ लादा जा रहा है, वह कितना उचित है? आज के विद्यालय बच्चों को मशीन बना दिये हैं । परीक्षा के परिणाम ही बच्चों की सफलता के मानक हो गये हैं । इन परिस्थितियों में भी बाल-साहित्य की उपलब्धता और पहुँच पर विचार करने की आवश्यकता है।
बाल-साहित्यकार का उद्देश्य केवल सामग्री का निर्माण ही नहीं है, उसकी उपलब्धता और पहुँच पर भी विचार करना भी है, शायद मेरी इस बात से आप सहमत न हों ? लेकिन आज का बालक और बाल-साहित्य दोनों ही बातों पर विचार करना होगा। पहला उनकी अपेक्षा के अनुरूप साहित्य सृजन और दूसरा उस साहित्य की बच्चों तक पहुँच।तब ही हम आज के बच्चों को समाज के लिए उपयोगी नागरिक बना सकेंगे।
-बलदाऊ राम साहू
दुर्ग, छत्तीसगढ़
मोबाइल-9407650458
मेल- br.ctd1958@gmail.com
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