Thursday, 3 September 2020

ग़ज़ल छाती अड़ाना आ गया है

 छाती अड़ाना आ गया है 


पतझरों का अब ज़माना आ गया है।

रूप हमको  नव  बनाना आ गया है।


कब तलक  हम  मौन  हो  बैठे रहते 

अब हमें भी  मुस्कुराना  आ गया है।


डर रही  हैं  अब  स्वयं  रातें  अँधेरी 

देख लो, सूरज उगाना  आ  गया है।


व्यर्थ हमको जो  चिढ़ाते  में  लगे थे 

आईना उनको  दिखाना आ गया है।


वो कबूतर लौट आया है 'बरस' फिर,

जानकर छाती अड़ाना  आ  गया  है।


-बलदाऊ राम साहू 

दुर्ग, छत्तीसगढ़

मोबाईल-9407650458

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