Saturday, 6 September 2014

उठो-उठो
                    


 मुर्गा बोला उठो-उठो तुम, उठो-उठो
प्रथम पहर है, उठो दिवस अब आया,
बुला रही है प्रात पवन अब उठो-उठो
चिडि़यों ने मधुर-मधुर है गीत सुनाया।

उठो-उठो अब बुला रहे हैं वृक्ष-लताएँ
जाग गया हैं यह जग सारा उठो-उठो।
उठो-उठो सूरज ने बाँहें फैला दी हैं
कितने करने काम अनोखे उठो-उठो।

कृषक बैल को हाँक रहा है, उठो-उठो
अवसर तुम से भाग रहा उठो-उठो।
भर लेना जीवन में खुशियाँ विश्राम नहीं
जीवन का उत्कर्ष आ गया उठो-उठो।

कठिन राह को सरल बनाने उठो-उठो
नव प्रात में भाग्य सजाने उठो-उठो
उठो उठो हर स्पंदन में आशाएँ हैं
जीवन को उत्सव मय करने उठो-उठो।

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