Friday, 30 May 2014

चूहों का बिल और औरतों का दिल

चूहों का बिल और औरतों का दिल

एक दिन मेरे पुराने मित्र प्रधान जी ने मुझसे नाराज़गी व्यक्त करते हुए कहा, साहू जी, आप कुछ भी सोचते हैं, कुछ भी लिखते हैं और कुछ भी बोल देते हैं। यह बात अलग है कि हम आपका सम्मान करते हैं, इसलिए ये बातें शालीन भाषा में कह रहें हैं अन्यथा कोई दूसरा होता तो कह देता कि कुछ भी बकते हो, यह आपको अच्छा नहीं लगता।
बिना संदर्भ के कही गई बातें मुझे समझ नर्हीं आइं, मैंने स्पष्टीकरण चाहते हुए कहा, ‘‘प्रधान जी, मैंने कुछ समझा नहीं।’’
इसमें समझने की क्या बात है? कभी तो आप मनुष्य को कुत्ते और कभी कुत्तों को मनुष्य से बेहतर बता देते हैं। अब आपने नया बखेडा खड़ा कर दिया है। ‘‘चूहों का बिल और औरतों का दिल कहकर।’’ है न यह बेतुकी बातें?
प्रधान जी की नाराजगी मुझे समझ में आ गई। उनका दिल मेरी व्यंग्य रचना से आहत हुआ था। वे बिलकुल भी सहमत नहीं थे, कुत्ते की तुलना मनुष्य से की जाए। उनका मानना था कि कुत्ते हमेशा मनुष्य से अब तक बेहतर ही साबित हुए हैं। वे कहना चाहते थे कि मनुष्य चैंसठ योनियों की यात्रा करके अपने समस्त पापों का प्रायश्चित करके पृथ्वी पर आता है, किंतु न जाने कुत्ते कितनी योनियों में जन्म लेने के पश्चात् इस अनोखे स्वरूप को प्राप्त करते हंै। वे चाहते थे कि मनुष्य को मनुष्य रहने दें और कुत्ते को कुत्ते। दोनों की तुलना कदाचित उचित नहीं है।
मैंने प्रधान जी से कहा, भाई प्रधान जी, आप व्यंग्य विधा के अच्छे जानकार हैं आपने तो भारत भर के श्रेष्ठ व्यंग्यकारों का सान्निध्य प्राप्त किया है इसलिए आप व्यंग्य के मर्म को मुझसे बेहतर समझते हैं। महासमुंद में रहते हुए आप लतिफ घोंघी जैसे वरिष्ट व्यंग्यकार के स्नेह पात्र रहे हैं।
प्रधान जी मेरे इस तर्क से भी सहमत नहीं हुए और पुनः खीसते हुए बोले, ‘‘इसका मतलब यह नहीं कि आप व्यंग्य को अपव्यंग्य कर दें। व्यंग्य के माध्यम से किसी विशेष प्राणी को अपमानित करना व्यंग्यकारों का दायित्व नहीं है। आप मनुष्य जैसे निकृष्ट जीव की तुलना कुत्ते जैसे श्रेष्ठ जीवों से नहीं कर सकते। आपने यह तुलना करके उनकी स्वामिभक्ति का अपमान किया है कुत्ते जैसा स्वामी भक्त तो मनुष्य कभी नहीं रहा है। मनुष्यों के बारे में यह उक्ति सदैव प्रचलित रही है कि वे जिस पत्तल में खाते हैं, उसी में छेद करते हैं। फिर यह नया विषय चूहों का बिल और औरतों का दिल आपकी फितरती दिमाग में कैसे आया ?’’
मैंने कहा, ‘‘प्रधान जी मेरा चिंतन तो कालिदास की भाँति है। जैसे कालिदास ने रघुवंश की रचना करते हुए कहा कि मेरे पूर्वज कवियों ने राम के बारे में कह कर मणि में छेद किया है और मैं तो उसमें धागा पिरोकर केवल माला बनाने का काम कर रहा हँू। वैसे ही हमारे पूर्ववर्ती व्यंग्यकारों ने इन विषयों पर बहुत मार्मिक ढंग से अनेक वृत्तांत दिए हैं। फिर आपने भी अपने यौवनकाल में यह अनुभूति की होगी कि औरतों के दिल में प्रवेश करना कितना कठिन कार्य होता है। जैसे चूहों को पहाड़, पर्वत, चट्टानों में बिल बनाने के लिए कठिन परिश्रम करना होता है, उसी प्रकार पुरुषों को भी औरतों के दिल में स्थान बनाने के लिए न जाने कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं। मेरा अनुभव तो इस मामले में बड़ा खराब रहा है। अपने यौवनकाल से इस प्रौढ़ावस्था के आते तक न जाने कितने ही नवयौवनाओं, अभिसारिकाओं और प्रौढ़ाओं के दिल में कोशिश की है, किंतु कभी भी अपेक्षित सफलता नहीं मिली है। असफलता का स्वाद चखते-चखते मुझमें निराशा के भाव आ गए हैं। बेचारी पत्नी को तो परवश होकर दिल देना पड़ा यदि अरेंज मैरिज नहीं होती, शायद उसके दिल में स्थान बना भी पाता या नहीं, यह नहीं कह सकता।
मेरे इस तर्क से प्रधान जी का क्रोध कुछ शांत हुआ। उन्हें लगने लगा कि सही में चूहों के लिए बिल बनाना जितना मुश्किल है उससे ज्यादा मुश्किल पत्थर दिल औरतों के दिल में स्थान बनाना है। उन्होंने मुझे इस विषय पर समाज को विचार देने के लिए साधुवाद देते हुए कहा कि साहू भाई, आपने तो मेरी सुषुप्ता अरमां को जगा दिया। बीते हुए कल को याद करता हँू, तो आज भी मेरी आँखों से आँंसू टपक पड़ते हैं। मुझे समझ नहीं आता कि क्यों कवियों ने पत्थर दिल औरतों को कोमलांगी और कोमल हृदया कहा होगा? यह कहते हुए उनकी आँखें नम हो गई।

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