Tuesday, 2 September 2014


रिश्तों का अहसास 

धरती प्यासी रह गई, रूठा जब आकाश।
क्यूँ फीका-सा लग रहा, रिश्तों का अहसास।

छीन लिया बाजार ने, गाँवों के वो भाव।
पत्थर बनता शहर है, बचा न कुछ भी पास।

जंजीरों से बँधी हुई, बेटी का संसार। 
जोह रही है बाट वो, मन में लेकर आस।

भाषण से वे नापते, लोगों के ज़ज़्बात।
विज्ञापन-सा लग रहा, अपनों का विष्वास।

पंछी कब आकाष में, उड़ पाते उन्मुक्त।
छुपकर बैठे बहेलिये, उनके ही आवास।

कंधों पर हल था कभी, उन पर अब बंदुक।
धरती की आँखें सजल, ओंठों पर है प्यास।


बेटे ने बनवा लिया, अपना इक संसार।
गुमसुम बूढ़ा बाप है, मां का हृदय उदास।

गली-गली में चल रहा , सपनों का व्यापार।
घीसू अब भी कर रहा, एक जुनिया उपवास।

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