Tuesday, 9 September 2014

बोलना मना है दोस्तों। 


है दाँत मगर, अब नहीं चना है दोस्तों,
बातें बहुत हैं, बोलना मना है दोस्तों।

चंदा की चाँदनी तो रात में है आज भी,
है अंधियारा, बादल घना है दोस्तों।

नहीं है कोई कातिल कहता है जमाना,
हरेक  हाथ खून से सना है दोस्तों।

पाने के लिए मंजिल निकले हुए हैं लोग
वो रास्ता मगर नहीं बना है दोस्तों।

झुकने लगी है रीढ़, जमाने की अब मगर,
ये आदमी बिना वजह, तना है दोस्तों।

मिलते नहीं हैं लोग बहुत भीड़ है यहाँ,
अब हैसियत पहचानना मना है दोस्तों।

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