गिरगिट की तरह रंग बदलता है आदमी
गिरगिट की तरह रंग बदलता है आदमी,सांपों-सा आस्तीन में पलता है आदमी ।
वो है रंगा सियार कहानी में जो रहा,
चालें भी लोमड़ी-सी चलता है आदमी।
जिस डाल पे बैठा है उसे काटता है वो,
अपने किए पे हाथ फिर मलता है आदमी।
पा तो लिया महारत, वो दुम हिलाने में
फिर भी यहाँ वहाँ पे उछलता है आदमी।
मुँह खून से सना है देखो जरा उसे,
गिद्धों की बस्तियों में पलता है आदमी।
कर ली है दोस्ती भी उसने अंधेरे से
सूरज से सुबह के भी जलता है आदमी।
बहुरूपियों का रूप धर लिया है उसी ने,
खुद को न जाने क्यूँ अब छलता है आदमी।
सूरज को दिया दिन में दिखाने लगा है वो,
हर रोज व्यर्थ मोम सा गलता है आदमी।
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