हिंदी ग़ज़ल
इंसानों के मन में कितनी उलझन है।
कठिन राह पर चलना ही तो जीवन है।
सुख औ’ दुख तो यूँ ही आते-जाते हैं।
घर-आँगन ही सबका नंदन-कानन है।
फूल खिले थे नन्हे-नन्हे, क्यारी में
आज वहीं भाई-भाई में अनबन है।
आसमान में उड़ने की आजादी है
पर अपनों से प्यार जताना, बंधन है।
जाति-धर्म के बीच दूरियाँ है लेकिन
इस दूरी को और बढ़ाना, लघुपन है।
कैसे हासिल राह अमन की सोचें अब
झाँकें अपने भीतर, जो मन दरपन है।
बलदाऊ राम साहू
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