Wednesday, 31 October 2018

सुरुज नवा उगा के देखन

सुरुज नवा उगा के देखन,
अँधियारी भगा के  देखन।

रोवत रहिथे   कतको इहाँ,
उनला हम हँसा के देखन।

भीतर मा सुलगत हे आगी,
आँसू  ले  बुझा  के  देखन।

कब तक रहहि दुरिहा-दुरिहा,
संग  ओला  लगा  के  देखन।

दुनिया  म कतको  दुखिया हे,
दुख ल ग़ज़ल बना के देखन।

बलदाऊ राम साहू

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